जयपुर: पूर्व राजपरिवार की संपत्ति पर सरकार को बड़ा झटका, अधीनस्थ कोर्ट ने दावा खारिज किया
राजस्थान सरकार को जयपुर के पूर्व राजपरिवार से जुड़ी संपत्ति को लेकर एक बड़ा झटका लगा है। मामले की सुनवाई करते हुए अधीनस्थ कोर्ट ने संपदा निदेशालय द्वारा दायर किए गए दावे को देरी के आधार पर खारिज कर दिया। इस फैसले के बाद सरकारी दावे पर बड़ी चोट लगी है और राज्य को अब कानूनी तौर पर नए विकल्प तलाशने पड़ सकते हैं।
जानकारी के अनुसार, राजस्थान सरकार की ओर से संपदा निदेशालय ने यह दावा किया था कि पूर्व राजपरिवार की कई संपत्तियों पर राज्य का हक है और उन्हें सरकारी नियंत्रण में लिया जाना चाहिए। लेकिन कोर्ट ने पाया कि यह दावा समय पर दायर नहीं किया गया और कानूनी प्रक्रिया में विलंब होने के कारण इसे खारिज करना पड़ा।
संपदा निदेशालय के अधिकारियों ने कहा कि वे कोर्ट के निर्णय का सम्मान करते हैं, लेकिन अब वे उच्च न्यायालय में अपील करने की संभावना पर विचार कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह संपत्ति इतिहास और राज्य की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी है, इसलिए इसे लेकर कानूनी लड़ाई जारी रहेगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि पूर्व राजपरिवार की संपत्तियों को लेकर राज्य और परिवार के बीच लंबे समय से विवाद चला आ रहा है। इनमें हवेलियां, बाग-बगीचे और अन्य महत्वपूर्ण संपत्तियां शामिल हैं। अक्सर इन संपत्तियों के नियंत्रण को लेकर सरकारी और निजी दावे टकराते रहे हैं, जिससे अदालतों में मामलों की लंबी प्रक्रिया होती रही है।
राज्य सरकार के लिए यह फैसला इसलिए भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि इसके चलते पुराने मामलों में सरकारी दावों की विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकते हैं। साथ ही, यह संपत्ति राज्य की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा होने के कारण जनता और प्रशासन दोनों के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह मामला सिर्फ सरकारी दावे और कानूनी जटिलताओं तक सीमित नहीं है। यह राज्य की ऐतिहासिक विरासत की सुरक्षा और इसके सही उपयोग से जुड़ा है। कई लोग उम्मीद कर रहे हैं कि अब सरकार उच्च न्यायालय में अपील करके मामले को आगे बढ़ाएगी।
संपदा विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में समय पर कानूनी कार्रवाई और दस्तावेजों की पूर्ण तैयारी जरूरी होती है। देरी या गलत प्रक्रिया से सरकारी दावे कमजोर हो सकते हैं, जैसा कि इस मामले में हुआ।
राजस्थान सरकार ने अब संपत्ति पर अपने अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए सभी कानूनी विकल्पों की समीक्षा शुरू कर दी है। अधिकारियों का कहना है कि उच्च न्यायालय में अपील दायर कर मामला फिर से प्रस्तुत किया जाएगा, ताकि राज्य का हक सुरक्षित रह सके।
इस फैसले ने ऐतिहासिक संपत्ति के मामलों में सरकारी और निजी दावों की जटिलताओं को उजागर किया है। राज्य सरकार को अब न केवल कानूनी रणनीति तैयार करनी होगी, बल्कि जनता और इतिहास की दृष्टि से भी संवेदनशील निर्णय लेने होंगे।