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जयपुर: ओबीसी आरक्षण की नई रिपोर्ट से पंचायती राज और शहरी निकाय चुनावों में हो सकता है राजनीतिक समीकरणों में बदलाव

 

राजस्थान में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण को लेकर नई हलचल तेज हो गई है। यह आरक्षण पंचायती राज संस्थाओं और शहरी निकाय चुनावों में राजनीतिक दलों के गणित को प्रभावित कर सकता है। अन्य पिछड़ा वर्ग (राजनीतिक प्रतिनिधित्व) आयोग ने अब ओबीसी सीटों के निर्धारण संबंधी रिपोर्ट को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

आयोग का कहना है कि वह सर्वेक्षण और जिलास्तर पर संवाद के बाद, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आधार पर रिपोर्ट तैयार कर रहा है। उम्मीद है कि यह रिपोर्ट इसी माह तैयार होकर सार्वजनिक कर दी जाएगी। आयोग की यह पहल उस समय अहम मानी जा रही है, जब कई जिलों में ओबीसी समुदाय की राजनीतिक भागीदारी और प्रतिनिधित्व को लेकर नई मांगें उठ रही हैं।

सूत्रों के अनुसार, कुछ जिलों में ओबीसी की उन जातियों को प्रतिनिधित्व देने की मांग की जा रही है, जिन्हें अब तक राजनीतिक प्रतिनिधित्व या तो नहीं मिला या बहुत सीमित मात्रा में मिला। वहीं, कई जिलों में यह भी सामने आया कि 1952 में ओबीसी सूची में शामिल जातियों को आरक्षण का लाभ अपेक्षित रूप से कम मिला, जबकि बाद में शामिल जातियों ने आरक्षण का लाभ अधिक उठाया। इस असंतुलन को सुधारने के लिए आयोग अब गंभीर रूप से काम कर रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि आयोग की यह रिपोर्ट आने के बाद पंचायती राज और शहरी निकाय चुनावों में सीटों के आरक्षण का ढांचा बदल सकता है, जिससे राजनीतिक दलों के लिए चुनावी रणनीति और उम्मीदवार चयन पर असर पड़ेगा। कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह कदम उन जातियों के लिए नई राजनीतिक संभावनाओं के दरवाजे खोल सकता है, जिन्हें अब तक उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला।

आयोग की प्रक्रिया में स्थानीय स्तर पर संवाद और सर्वेक्षण को अहम माना जा रहा है। इसके तहत ग्रामीण और शहरी इलाकों में ओबीसी समुदाय की वास्तविक स्थिति, जनसंख्या, सामाजिक एवं आर्थिक स्तर का अध्ययन किया जा रहा है। इससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि आरक्षण का लाभ सही तरीके से उन वर्गों तक पहुंचे जो अब तक राजनीतिक प्रतिनिधित्व से वंचित रहे।

राजस्थान के कई जिलों में इस मुद्दे को लेकर पहले ही राजनीतिक हलचल शुरू हो चुकी है। उम्मीदवार और राजनीतिक दल अब आरक्षित सीटों के नए गणित को ध्यान में रखते हुए अपनी रणनीति पर काम कर रहे हैं। आयोग की रिपोर्ट के आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि किस जिले और क्षेत्र में कौन सी जातियों को प्रतिनिधित्व मिलेगा।

आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि उनका उद्देश्य केवल सांख्यिकीय आंकड़ों के आधार पर निष्पक्ष आरक्षण सुनिश्चित करना है, ताकि सभी पिछड़ा वर्ग के समुदायों को न्यायसंगत प्रतिनिधित्व मिले। इससे न केवल पंचायती राज और शहरी निकाय चुनावों में संतुलन आएगा, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को भी मजबूत बनाने में मदद मिलेगी।