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राजस्थान में टीबी-मुक्त अभियान पर संकट, एक्सक्लूसिव फुटेज में देंखे CB-NAAT जांच किट की भारी कमी से ठप हुई व्यवस्था

 

राजस्थान को टीबी-मुक्त बनाने का सरकारी सपना जमीनी हकीकत में दम तोड़ता नजर आ रहा है। प्रदेश में हालात ऐसे बन गए हैं कि टीबी की सबसे अहम और आधुनिक जांच सीबी-नॉट (CB-NAAT) के बिना ही पूरा हेल्थ सिस्टम चलाने की मजबूरी पैदा हो गई है। जांच किट की भारी कमी के चलते राज्य सरकार की ओर से सभी ग्राम पंचायतों को टीबी-मुक्त बनाने के लिए चलाया जा रहा अभियान लगभग ठप पड़ चुका है।

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सबसे चिंताजनक स्थिति यह है कि राजधानी जयपुर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल सवाई मानसिंह मेडिकल कॉलेज (SMS मेडिकल कॉलेज) में भी पिछले करीब तीन महीनों से सीबी-नॉट जांच पूरी तरह बंद पड़ी है। यहां रोजाना सैकड़ों की संख्या में टीबी संदिग्ध मरीज इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं, लेकिन जांच सुविधा न होने के कारण उन्हें या तो निजी लैब का रुख करना पड़ता है या फिर बिना पुख्ता जांच के इलाज शुरू करना पड़ रहा है। आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों के लिए यह स्थिति और भी ज्यादा परेशानी भरी साबित हो रही है।

दरअसल, टीबी की पहचान के लिए सीबी-नॉट जांच को सबसे प्रभावी और भरोसेमंद माना जाता है। यह जांच न सिर्फ टीबी की पुष्टि करती है, बल्कि यह भी बताती है कि मरीज में दवा-प्रतिरोधी टीबी (DR-TB) है या नहीं। ऐसे में इस जांच के बिना टीबी के सही और समय पर इलाज पर सवाल खड़े हो रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर जांच न होने से न केवल मरीज की हालत बिगड़ सकती है, बल्कि संक्रमण के फैलने का खतरा भी बढ़ जाता है।

जानकारी के अनुसार, राज्य सरकार का हेल्थ डिपार्टमेंट प्रदेशभर में सीबी-नॉट जांच के लिए आवश्यक किट ही उपलब्ध नहीं करवा पा रहा है। कई जिलों में मशीनें तो मौजूद हैं, लेकिन किट के अभाव में वे शोपीस बनकर रह गई हैं। यही वजह है कि ग्रामीण इलाकों में टीबी की पहचान और इलाज की रफ्तार बेहद धीमी पड़ गई है, जिससे टीबी-मुक्त ग्राम पंचायतों का लक्ष्य अधर में लटक गया है।

स्वास्थ्य विभाग द्वारा समय-समय पर टीबी उन्मूलन को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर व्यवस्थाओं की यह हालत सरकार की तैयारियों पर सवाल खड़े कर रही है। डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों का कहना है कि अगर जल्द ही सीबी-नॉट किट की आपूर्ति बहाल नहीं हुई, तो टीबी नियंत्रण कार्यक्रम को भारी नुकसान हो सकता है।

वहीं, मरीजों और उनके परिजनों में भी गहरा रोष देखने को मिल रहा है। लोगों का कहना है कि सरकार एक तरफ टीबी को खत्म करने की बात कर रही है, वहीं दूसरी तरफ जरूरी जांच सुविधाएं तक मुहैया नहीं करवा पा रही है। निजी जांच महंगी होने के कारण गरीब मरीज इलाज से वंचित हो रहे हैं।

कुल मिलाकर, राजस्थान में टीबी उन्मूलन की दिशा में चल रहे प्रयास इस समय गंभीर संकट से गुजर रहे हैं। अगर सरकार ने जल्द ही हालात नहीं संभाले, तो टीबी-मुक्त प्रदेश का सपना केवल कागजों तक ही सीमित रह सकता है।