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राजस्थान में फ्री इलाज के क्लेम हो रहे रिजेक्ट, वीडियो में देखें करोड़ों के क्लेम रिजेक्ट होने पर 28 सरकारी अस्पतालों को नोटिस

 

राजस्थान में भजनलाल सरकार की महत्वाकांक्षी फ्री इलाज योजना मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य योजना (MAA) में गंभीर गड़बड़ियों का मामला सामने आया है। योजना के क्रियान्वयन में लापरवाही के चलते सरकार को करोड़ों रुपये का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। सरकारी अस्पतालों में प्रशासनिक स्तर पर की जा रही चूक और निचले कर्मचारियों की लापरवाही के कारण बीमा कंपनियां बड़ी संख्या में इलाज से जुड़े क्लेम रिजेक्ट कर रही हैं।

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सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य योजना के तहत पात्र मरीजों का कैशलेस इलाज किया जाता है और इलाज के बाद संबंधित खर्च का भुगतान बीमा कंपनी द्वारा किया जाता है। लेकिन कई सरकारी अस्पतालों में समय पर और सही तरीके से दस्तावेज अपलोड नहीं किए जा रहे हैं। कहीं इलाज से जुड़ी आवश्यक एंट्री अधूरी है तो कहीं मरीजों के रिकॉर्ड में तकनीकी खामियां पाई जा रही हैं। इन्हीं कारणों से बीमा कंपनियां क्लेम खारिज कर रही हैं, जिससे सरकारी खजाने को सीधा नुकसान हो रहा है।

बढ़ते क्लेम रिजेक्शन के मामलों को गंभीरता से लेते हुए मेडिकल एज्युकेशन डिपार्टमेंट के कमिश्नर नरेश कुमार गोयल ने सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने प्रदेश के 28 सरकारी अस्पतालों के प्रमुखों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। इनमें मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों के अधीक्षक और प्रमुख चिकित्सा अधिकारी (CMO) शामिल हैं। नोटिस में स्पष्ट किया गया है कि आखिर किन कारणों से इन अस्पतालों में क्लेम रिजेक्ट होने की संख्या ज्यादा है और इसके लिए जिम्मेदार कौन है।

कमिश्नर नरेश कुमार गोयल ने सभी संबंधित अस्पताल प्रमुखों को तीन दिन के भीतर जवाब देने के निर्देश दिए हैं। साथ ही यह भी कहा गया है कि यदि जवाब संतोषजनक नहीं पाया गया तो संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। विभागीय स्तर पर यह भी संकेत दिए गए हैं कि भविष्य में ऐसी लापरवाही दोहराने पर सख्त कदम उठाए जाएंगे।

स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य योजना राज्य सरकार की फ्लैगशिप योजना है, जिसका उद्देश्य गरीब और जरूरतमंद लोगों को मुफ्त और बेहतर इलाज उपलब्ध कराना है। लेकिन यदि अस्पताल स्तर पर ही लापरवाही बरती जाएगी तो योजना की विश्वसनीयता और प्रभाव दोनों पर सवाल खड़े होंगे। क्लेम रिजेक्ट होने से न केवल सरकार को नुकसान हो रहा है, बल्कि अस्पतालों के बजट और संसाधनों पर भी असर पड़ रहा है।

बताया जा रहा है कि कुछ अस्पतालों में प्रशिक्षित स्टाफ की कमी और योजना से जुड़े नियमों की पूरी जानकारी न होना भी समस्या की एक बड़ी वजह है। इसके बावजूद विभाग का मानना है कि लगातार प्रशिक्षण और स्पष्ट दिशा-निर्देश के बाद भी ऐसी चूक होना गंभीर लापरवाही की श्रेणी में आता है।

राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में इस मामले को लेकर चर्चा तेज हो गई है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में सरकार इस योजना की मॉनिटरिंग और सख्त कर सकती है, ताकि क्लेम रिजेक्शन की समस्या पर लगाम लगाई जा सके। अब सबकी नजर 28 सरकारी अस्पतालों के जवाब पर टिकी है, जिससे यह साफ हो सके कि इस बड़े नुकसान के पीछे असली वजह क्या है और जिम्मेदारी किसकी बनती है।