डूंगरपुर के भीलूड़ा गांव में धुलंडी पर अनोखी ‘पत्थर होली’, 31 लोग घायल
राजस्थान के आदिवासी बहुल जिला डूंगरपुर अपनी अनूठी होली परंपराओं के लिए पूरे देश में जाना जाता है। यहां के कई गांवों में होली केवल रंग-गुलाल तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पारंपरिक और चुनौतीपूर्ण खेलों के रूप में भी मनाई जाती है। इस बार धुलंडी के मौके पर भीलूड़ा गांव में होली की एक अनोखी और जोखिम भरी परंपरा देखने को मिली – पत्थरों की होली।
जानकारी के अनुसार, भीलूड़ा गांव में शाम के समय दो गुटों के बीच इस परंपरागत खेल का आयोजन हुआ। ढोल-ढमाकों और कुंडी की थाप के बीच दोनों पक्ष होली की चीत्कार करते हुए एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते रहे। ग्रामीणों के अनुसार यह खेल कई पीढ़ियों से चले आ रही परंपरा का हिस्सा है, जिसे उत्सव के रूप में देखा जाता है।
हालांकि इस खेल में सुरक्षा की दृष्टि से कोई खास इंतजाम नहीं होने के कारण खेल के दौरान 31 लोग घायल हो गए। घायलों में कुछ के हाथ, पैर और सिर पर चोटें आईं। घायल ग्रामीणों को तुरंत भीलूड़ा अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनका इलाज चल रहा है। स्थानीय चिकित्सकों के अनुसार, सभी घायलों की स्थिति स्थिर है और उन्हें आवश्यक प्राथमिक उपचार दिया जा रहा है।
स्थानीय लोगों ने बताया कि पत्थरों की होली खेलना गांव की सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है और इसे उत्सव की भावना के साथ मनाया जाता है। हालांकि, इस बार घायलों की संख्या बढ़ जाने के बाद प्रशासन ने चेतावनी जारी की है कि भविष्य में इस तरह की होली खेलते समय सावधानी बरतनी होगी और सुरक्षा उपायों का ध्यान रखना आवश्यक है।
इस घटना ने ग्रामीणों और प्रशासन दोनों के लिए चेतावनी की तरह काम किया है। जिला प्रशासन ने भी आगाह किया है कि अगले साल से इस परंपरा को नियंत्रित और सुरक्षित तरीके से ही मनाया जाए। इसके लिए संभावित सुरक्षा उपायों पर विचार किया जा रहा है, ताकि किसी को गंभीर चोट न पहुंचे और परंपरा भी जारी रह सके।
डूंगरपुर जिले में होली के त्योहार का उत्साह अत्यधिक रहता है। यहां आदिवासी समाज रंग-गुलाल और पारंपरिक नृत्यों के साथ-साथ कई अनोखी परंपराओं के जरिए अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखता है। हालांकि पत्थरों की होली जैसी परंपराओं में जोखिम अधिक होता है, फिर भी ग्रामीण इसे अपनी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा मानते हैं।
इस प्रकार भीलूड़ा गांव में हुई घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि परंपराओं और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना कितना आवश्यक है। प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और ग्रामीण मिलकर आगे ऐसी घटनाओं को रोकने और परंपरा को सुरक्षित तरीके से निभाने पर काम करेंगे।
डूंगरपुर की यह पत्थर होली न केवल अनूठी है, बल्कि यह स्थानीय आदिवासी जीवन और उनके उत्सव मनाने के तरीके की एक झलक भी पेश करती है। उम्मीद है कि भविष्य में यह परंपरा और अधिक सुरक्षित रूप में लोगों को सांस्कृतिक आनंद देती रहेगी।