खेजड़ी बचाने की लड़ाई को मिली बड़ी जीत, बीकानेर महापड़ाव में 500 से अधिक लोगों ने तोड़ा अनशन; अब पूरे प्रदेश में ट्री एक्ट की मांग तेज
राजस्थान के राजकीय वृक्ष ‘खेजड़ी’ को बचाने की मुहिम अब जनआंदोलन का रूप ले चुकी है। बीकानेर में पिछले पांच दिनों से चल रहे महापड़ाव में शनिवार को आंदोलनकारियों को बड़ी सफलता मिली। प्रशासन की ओर से सकारात्मक आश्वासन मिलने के बाद 500 से अधिक लोगों ने अपना अनशन समाप्त कर दिया। हालांकि आंदोलन अभी खत्म नहीं हुआ है और सैकड़ों लोग अब भी धरना स्थल पर डटे हुए हैं।
खेजड़ी संरक्षण को लेकर चल रहे इस आंदोलन में ग्रामीणों, पर्यावरण प्रेमियों, सामाजिक संगठनों और युवाओं की बड़ी भागीदारी देखने को मिल रही है। आंदोलनकारियों का कहना है कि खेजड़ी सिर्फ एक पेड़ नहीं, बल्कि राजस्थान की संस्कृति, पर्यावरण और आजीविका का आधार है। ऐसे में इसकी अंधाधुंध कटाई किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
धरना स्थल पर पिछले पांच दिनों से लोग दिन-रात डटे रहे। कई लोगों ने आमरण अनशन शुरू कर दिया था, जिससे प्रशासन की चिंता बढ़ गई। स्वास्थ्य बिगड़ने की आशंका के बीच प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों ने आंदोलनकारियों से वार्ता की। बताया जा रहा है कि वार्ता में खेजड़ी संरक्षण को लेकर ठोस कदम उठाने का भरोसा दिया गया, जिसके बाद बड़ी संख्या में लोगों ने अपना अनशन समाप्त किया।
हालांकि आंदोलनकारी नेताओं का कहना है कि यह लड़ाई केवल बीकानेर या जोधपुर तक सीमित नहीं है। उनका मुख्य उद्देश्य पूरे राजस्थान में सख्त ‘ट्री एक्ट’ लागू कराना है, ताकि बिना अनुमति पेड़ों की कटाई पर कड़ी सजा और जुर्माने का प्रावधान हो। उनका कहना है कि जब तक सरकार कानून बनाकर वृक्षों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं करती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।
धरना स्थल पर जुटे लोगों ने सरकार के खिलाफ नारेबाजी की और खेजड़ी बचाने का संकल्प दोहराया। कई वक्ताओं ने कहा कि खेजड़ी मरुस्थलीय इलाकों में जीवनदायिनी है। यह पशुओं के चारे, ईंधन और मिट्टी संरक्षण में अहम भूमिका निभाती है। इसके बावजूद विकास कार्यों के नाम पर लगातार पेड़ों की कटाई हो रही है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का भी मानना है कि खेजड़ी का संरक्षण जलवायु संतुलन और मरुस्थल क्षेत्र की पारिस्थितिकी के लिए बेहद जरूरी है। फिलहाल प्रशासन हालात पर नजर बनाए हुए है। धरना स्थल पर पुलिस बल तैनात है, लेकिन माहौल शांतिपूर्ण बना हुआ है। आंदोलनकारियों का कहना है कि यह संघर्ष पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए है, इसलिए वे पीछे हटने वाले नहीं हैं।