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भरतपुर में सिलिकोसिस से तीन लोगों की मौत, दो गांवों के 70% लोग बीमारी से पीडित

 

भरतपुर के आरबीएम अस्पताल में सिलिकोसिस से पीड़ित तीन मरीजों की मौत हो गई। ये मरीज लंबे समय से इस लाइलाज बीमारी से पीड़ित थे। मृतक घनश्याम खेड़ा ठाकुर गांव के रहने वाले थे, जबकि रामलाल और नरेश सिंह निभेरा गांव के निवासी थे। तीनों की इलाज के दौरान मौत हो गई। खेड़ा ठाकुर और निभेरा गांव के लगभग 70 प्रतिशत लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं। यह एक लाइलाज बीमारी है.

सिलिकोसिस रोग क्या है?
सिलिकोसिस एक लाइलाज बीमारी है जो क्रिस्टलीय सिलिका धूल कणों को सांस के माध्यम से अन्दर लेने से होती है। यह धूल फेफड़ों में जमा हो जाती है, जिससे सूजन, फाइब्रोसिस और फेफड़ों की कार्यक्षमता में धीरे-धीरे गिरावट आती है। यह रोग मुख्यतः निर्माण, खनन और पत्थर प्रसंस्करण क्षेत्रों में कार्यरत श्रमिकों को प्रभावित करता है। इसके लक्षणों में लगातार खांसी, सांस लेने में कठिनाई और अत्यधिक थकान शामिल हैं।

बचाव उपाय और प्रशासनिक लापरवाही
वर्तमान में सिलिकोसिस का कोई इलाज नहीं है, लेकिन उचित सुरक्षा उपाय अपनाकर इसे रोका जा सकता है। काम करते समय श्रमिकों को मास्क पहनना अनिवार्य है। दुख की बात यह है कि खनिज विभाग और संबंधित ठेकेदारों की लापरवाही के कारण मजदूरों को बिना किसी सुरक्षा उपकरण के काम करने को मजबूर होना पड़ रहा है। पत्थर काटते समय उठने वाली धूल सीधे फेफड़ों में जा रही है और जानलेवा साबित हो रही है।

अब तक 650 लोगों की मौत हो चुकी है।
जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ. अविरल सिंह ने बताया कि सिलिकोसिस के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन सुविधा वर्ष 2018 में शुरू की गई थी। वर्ष 2022 से अब तक 4400 से अधिक रजिस्ट्रेशन हो चुके हैं। खेड़ा ठाकुर और निभेरा गांव के लोग पहाड़ों में काम करते हैं, जहां चट्टानों में काम करते समय सिलिका के संपर्क में आने से यह बीमारी होती है और इन गांवों के लगभग 70% लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं। सरकार द्वारा बीमारी घोषित होने पर तीन लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी जाती है तथा मृत्यु होने पर दो लाख रुपये तथा अंतिम संस्कार के लिए दस हजार रुपये दिए जाते हैं।