अजमेर में शिया समुदाय ने सादगी और शोक के माहौल में मनाई ईद-उल-फितर, विरोध और आक्रोश भी रहा मुखर
राजस्थान के अजमेर शहर में इस बार ईद-उल-फितर का पर्व शिया समुदाय ने सादगी और शोक के माहौल में मनाया। सामान्यतः जहां ईद का त्योहार खुशियों, नए कपड़ों और आपसी मेल-जोल का प्रतीक माना जाता है, वहीं इस बार समुदाय ने पारंपरिक उत्सवों से दूरी बनाकर एक अलग ही संदेश दिया।
अजमेर में शिया समुदाय के लोगों ने काली पट्टी बांधकर नमाज अदा की। इस दौरान न तो नए कपड़े पहने गए और न ही घरों में कोई विशेष खुशी या उत्सव मनाया गया। समुदाय के लोगों ने सादगी अपनाते हुए ईद की नमाज अदा की और शांति व भाईचारे की दुआ मांगी।
बताया जा रहा है कि यह फैसला ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह सैय्यद अली खामेनाई के प्रति शोक व्यक्त करने के उद्देश्य से लिया गया। समुदाय के लोगों ने उनकी मौत पर गहरा शोक जताते हुए ईद के उत्सव को सीमित रखते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की।
इस अवसर पर समुदाय के भीतर आक्रोश भी देखने को मिला। लोगों ने इजराइल और अमेरिका के खिलाफ विरोध जताते हुए अपने विचार व्यक्त किए। नमाज के दौरान भी माहौल शांत लेकिन भावनात्मक रहा, जहां लोग अपनी भावनाओं को संयमित रखते हुए धार्मिक अनुष्ठान में शामिल हुए।
ईद-उल-फितर की नमाज मौलाना सैय्यद तकी जाफर ने अदा करवाई। इस दौरान मौलाना सैय्यद शमीमुल हसन, मौलाना हैदर बिजनौरी सहित बड़ी संख्या में शिया समुदाय के लोग मौजूद रहे। सभी ने मिलकर नमाज अदा की और देश-दुनिया में शांति, अमन और भाईचारे की दुआ की।
पूरे आयोजन के दौरान सुरक्षा और शांति व्यवस्था बनी रही। स्थानीय स्तर पर लोगों ने इस शांतिपूर्ण आयोजन को एक अनुशासित और भावनात्मक रूप में देखा, जहां धार्मिक भावनाओं के साथ-साथ वैश्विक घटनाओं का प्रभाव भी स्पष्ट रूप से झलक रहा था।
इस प्रकार अजमेर में शिया समुदाय द्वारा ईद-उल-फितर का यह आयोजन पारंपरिक उत्सव से अलग, सादगी, शोक और संवेदनशीलता का प्रतीक बनकर सामने आया, जिसने एक अनोखा संदेश दिया।