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अजमेर में 350 साल पुरानी परंपरा के साथ लाल्या–काल्या मेले का आयोजन, वीडियो में जाने आस्था का अनोखा संगम

 

अजमेर के नया बाजार क्षेत्र में गुरुवार को सदियों पुरानी परंपरा के तहत प्रसिद्ध लाल्या–काल्या मेले का आयोजन किया गया। करीब 350 साल पुरानी इस अनूठी धार्मिक परंपरा में आस्था, लोकविश्वास और संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिला।

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मेले में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए और उन्होंने भगवान विष्णु के वराह और नृसिंह अवतार से जुड़ी लोक-लीलाओं के दर्शन किए। पूरा आयोजन भक्ति और उत्साह के माहौल में सम्पन्न हुआ, जहां श्रद्धालु पारंपरिक आस्था के साथ इस अनोखी परंपरा का हिस्सा बने।

इस मेले की सबसे खास पहचान यह रही कि श्रद्धालु ‘लाल्या’ (वराह अवतार के प्रतीक) के सोटे का स्पर्श प्रसाद के रूप में स्वीकार करते नजर आए। मान्यता है कि लाल्या का सोटा लगने या उसका आशीर्वाद मिलने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और रुके हुए कार्य बनने लगते हैं।

वहीं दूसरी ओर, ‘काल्या’ के सोटे से बचने की परंपरा भी इस आयोजन का हिस्सा रही, जिसे लोग अशुभ संकेत के रूप में मानते हैं। श्रद्धालु पूरे मेले में इस परंपरागत रस्म को निभाते हुए उत्साह और श्रद्धा के साथ भाग लेते दिखे।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और इसका संबंध लोककथाओं तथा धार्मिक विश्वासों से जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि यह आयोजन बुराई पर अच्छाई की जीत और जीवन में संतुलन के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।

मेले के दौरान सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण के लिए स्थानीय प्रशासन द्वारा विशेष व्यवस्था की गई थी। पूरे क्षेत्र में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी, लेकिन आयोजन शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत का भी हिस्सा है, जो पीढ़ियों से परंपरा के रूप में चला आ रहा है।

कुल मिलाकर, अजमेर का लाल्या–काल्या मेला आस्था, लोकविश्वास और परंपरा का ऐसा अनोखा संगम बन गया, जिसने श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभव के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों से भी जोड़ दिया।