अजमेर फोटो ब्लैकमेलिंग कांड, वीडियो में देखें डेढ़ साल बाद भी केवल दो पीड़िताओं को मिला मुआवजा
शहर के चर्चित फोटो ब्लैकमेलिंग कांड की पीड़िताओं को न्यायालय के आदेशों के डेढ़ साल बाद भी अब तक पर्याप्त मुआवजा नहीं मिला है। कुल 17 में से केवल दो ही पीड़िताओं को मुआवजा राशि प्रदान की गई है। यह जानकारी गुरुवार को भाजपा विधायक संदीप शर्मा के सवाल के लिखित जवाब में राज्य सरकार ने दी।
सरकार के जवाब में कहा गया कि बची हुई पीड़िताओं और उनके परिजनों ने मुआवजा लेने में रुचि नहीं दिखाई है। इसके तहत जिला विधिक सेवा प्राधिकरण ने अब तक केवल दो पीड़िताओं को कुल 14 लाख रुपये मुआवजा राशि के रूप में प्रदान किए हैं।
जानकारी के अनुसार, मुआवजा राशि न मिलने के पीछे एक बड़ी वजह यह भी है कि अधिकांश पीड़िताएं अपनी पहचान छिपाकर रह रही हैं। इसके कारण उनसे संपर्क करना मुश्किल हो रहा है। हालांकि, बची हुई 14 पीड़िताओं और उनके परिजनों से मुआवजा राशि दिलवाने के लिए संपर्क किया गया, लेकिन अब तक किसी ने इसे लेने में कोई रुचि नहीं दिखाई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस मामले में न्यायालय ने तुरंत मुआवजा देने के आदेश दिए थे, ताकि पीड़िताओं को मानसिक और आर्थिक मदद मिल सके। बावजूद इसके, लंबे समय तक मुआवजा न मिलने से पीड़िताओं में असंतोष देखा जा रहा है। कई अधिकारकर्मी मानते हैं कि पहचान छिपाने की स्थिति में भी विधिक प्राधिकरण को प्रभावी उपाय करने चाहिए, ताकि पीड़िताओं को न्याय और राहत समय पर मिल सके।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस मामले में सरकारी जवाब में यह तर्क देना कि पीड़िताएं मुआवजा लेने में इच्छुक नहीं हैं, व्यापक आलोचना का कारण बन सकता है। पीड़िताओं के लिए मुआवजा केवल आर्थिक मदद नहीं, बल्कि समाज में न्याय की प्रतीक भी है।
2019 में उजागर हुए इस फोटो ब्लैकमेलिंग कांड ने पूरे अजमेर को झकझोर दिया था। इसमें कई महिलाओं की तस्वीरों और निजी जानकारियों का गलत इस्तेमाल कर उन्हें ब्लैकमेल किया गया था। इस मामले ने सामाजिक और कानूनी स्तर पर गंभीर बहस छेड़ दी थी। अदालत ने जल्द से जल्द मुआवजा देने के आदेश दिए थे, लेकिन अब तक अधिकांश पीड़िताओं तक यह राहत नहीं पहुँच पाई है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह आवश्यक है कि प्राधिकरण और संबंधित विभाग पीड़िताओं के विश्वास को बहाल करें और उन्हें मुआवजा लेने के लिए प्रेरित करें। साथ ही, मामले में सख्त निगरानी रखकर यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कोई भी पीड़िता अपने अधिकार से वंचित न रहे।
इस मामले में अब सवाल यह उठता है कि न्यायिक आदेशों के बावजूद पीड़िताओं तक मुआवजा क्यों नहीं पहुंच पा रहा है और सरकार किस प्रकार इस प्रक्रिया को तेज करेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार और विधिक प्राधिकरण के लिए यह एक चुनौती है, जिसे शीघ्र हल करना आवश्यक है।