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युद्ध के बीच पुतिन क्यों बेच रहे हैं रूस का सोना? 24 साल का रिकॉर्ड टूटा, दुनिया भर में बढ़ी हलचल

 

Vladimir Putin के नेतृत्व वाले Russia को लेकर एक नई चर्चा तेज हो गई है। खबरें हैं कि रूस ने बड़े पैमाने पर अपने सोने के भंडार की बिक्री शुरू कर दी है, जिससे पिछले 24 सालों का रिकॉर्ड टूट गया है। यूक्रेन युद्ध के बीच इस कदम ने वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। अब सवाल उठ रहा है कि क्या रूस किसी बड़े आर्थिक संकट की ओर बढ़ रहा है या फिर इसके पीछे कोई रणनीतिक कारण छिपा है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, रूस लंबे समय से दुनिया के सबसे बड़े गोल्ड रिजर्व रखने वाले देशों में शामिल रहा है। पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बाद रूस ने डॉलर पर निर्भरता कम करने और अपनी अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिए सोने का भंडार लगातार बढ़ाया था। लेकिन अब अचानक बड़े स्तर पर सोना बेचे जाने की खबरों ने कई तरह की अटकलों को जन्म दे दिया है।

आर्थिक जानकारों का मानना है कि यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी प्रतिबंधों की वजह से रूस पर वित्तीय दबाव बढ़ा है। युद्ध में भारी खर्च, अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर असर और विदेशी निवेश में गिरावट जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए रूस को नकदी की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में गोल्ड रिजर्व बेचना सरकार के लिए एक विकल्प माना जा रहा है।

हालांकि कुछ विशेषज्ञ इसे संकट नहीं, बल्कि रणनीतिक आर्थिक कदम बता रहे हैं। उनका कहना है कि रूस वैश्विक बाजार की मौजूदा स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश कर सकता है। हाल के वर्षों में सोने की कीमतों में तेज बढ़ोतरी देखने को मिली है। ऐसे में ऊंचे दाम पर सोना बेचकर रूस अपने विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने की रणनीति अपना सकता है।

एक और बड़ा कारण रूसी मुद्रा रूबल को स्थिर बनाए रखना भी माना जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और आर्थिक दबाव के बीच सरकार विदेशी मुद्रा और वित्तीय संतुलन बनाए रखने के लिए रिजर्व का इस्तेमाल कर सकती है।

इस घटनाक्रम ने वैश्विक बाजारों की चिंता भी बढ़ा दी है। निवेशकों की नजर अब रूस की आर्थिक स्थिति और युद्ध के अगले चरण पर टिकी हुई है। अगर रूस बड़े पैमाने पर लगातार सोना बेचता रहा, तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय गोल्ड मार्केट पर भी पड़ सकता है।

वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम केवल आर्थिक नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। रूस लगातार पश्चिमी देशों के दबाव का मुकाबला करने के लिए नए आर्थिक रास्ते तलाश रहा है।

फिलहाल रूस की ओर से इस मुद्दे पर विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन 24 साल का रिकॉर्ड टूटने की खबर ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर जरूर खींच लिया है। अब आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह कदम रूस की मजबूरी है, रणनीति है या किसी बड़े आर्थिक बदलाव की शुरुआत।