कमजोर मॉनसून से बढ़ी किसानों की चिंता, 19 लाख हेक्टेयर कम हुई खरीफ की बुआई; धान पर सबसे ज्यादा असर
क्या इस साल कमजोर मॉनसून का असर आने वाले दिनों में आपकी रसोई तक भी पहुंच सकता है? फिलहाल केंद्र सरकार ने खाद्यान्न उत्पादन को लेकर किसी बड़े संकट की आशंका से इनकार किया है, लेकिन बारिश की कमी ने खेती-किसानी को लेकर चिंता जरूर बढ़ा दी है।
कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक 28 अगस्त 2026 तक देश में खरीफ फसलों की बुआई पिछले साल के मुकाबले 18.91 लाख हेक्टेयर कम हुई है। सबसे ज्यादा असर धान की खेती पर देखने को मिला है। एक साल में धान का बुआई क्षेत्र करीब 14.36 लाख हेक्टेयर घट गया है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर सितंबर में भी बारिश सामान्य से कम रही तो क्या इसका असर फसल उत्पादन पर पड़ सकता है?
बारिश की कमी का खेती पर दिखने लगा असर
मॉनसून सीजन की शुरुआत में कुछ क्षेत्रों में अच्छी बारिश हुई थी, जिससे उम्मीद जगी थी कि बारिश की कमी पूरी हो जाएगी। हालांकि, अगस्त के दूसरे हिस्से में मॉनसून कमजोर पड़ गया।
1 जून से 30 अगस्त के बीच देश में सामान्य से करीब 14 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई। पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत में स्थिति ज्यादा चुनौतीपूर्ण रही, जहां बारिश की कमी करीब 26.3 फीसदी तक पहुंच गई।
दक्षिण भारत में भी सामान्य से 23.7 फीसदी कम बारिश हुई। वहीं उत्तर-पश्चिम भारत में 10.7 फीसदी और मध्य भारत में 3.6 फीसदी की कमी दर्ज की गई।
सबसे ज्यादा चौंकाने वाला आंकड़ा मेघालय का रहा। देश के सबसे अधिक बारिश वाले राज्यों में शामिल मेघालय में इस बार सामान्य से करीब 58 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई।
इन राज्यों में बारिश की कमी ज्यादा
मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार कई प्रमुख कृषि राज्यों में बारिश सामान्य से काफी कम रही है।
- आंध्र प्रदेश: 41 फीसदी कमी
- बिहार: 40 फीसदी कमी
- पंजाब: 36 फीसदी कमी
- असम: 26 फीसदी कमी
- राजस्थान: 23 फीसदी कमी
- कर्नाटक: 23 फीसदी कमी
- केरल: 21 फीसदी कमी
- तमिलनाडु: 20 फीसदी कमी
बारिश की कमी का असर किसानों की बुआई के साथ-साथ फसलों की शुरुआती ग्रोथ पर भी पड़ रहा है। जिन इलाकों में पर्याप्त नमी नहीं है, वहां किसानों के लिए फसल की बुआई और उसे बनाए रखना चुनौती बन गया है।
धान की खेती पर सबसे ज्यादा दबाव
कम बारिश का सबसे बड़ा असर धान की खेती पर दिखाई दे रहा है। धान भारत की प्रमुख खरीफ फसलों में शामिल है और देश की खाद्य सुरक्षा के लिए इसका उत्पादन बेहद महत्वपूर्ण है।
कृषि मंत्रालय के मुताबिक 28 अगस्त तक धान की बुआई पिछले साल की तुलना में 14.36 लाख हेक्टेयर कम रही। धान की खेती में पानी की जरूरत ज्यादा होती है। ऐसे में जिन क्षेत्रों में मॉनसून कमजोर रहा, वहां कुछ किसानों ने बुआई में देरी की या खेती का रकबा कम कर दिया।
क्या खाद्यान्न उत्पादन पर पड़ेगा असर?
फिलहाल केंद्र सरकार स्थिति को लेकर बहुत ज्यादा चिंतित नहीं है। सरकार का मानना है कि खरीफ सीजन अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और सितंबर की बारिश फसलों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी कहा था कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए अभी खाद्यान्न उत्पादन पर बड़े असर की संभावना नजर नहीं आ रही है। अगर सितंबर में अच्छी बारिश होती है और फसलों की बढ़वार बेहतर रहती है, तो कम बुआई के बावजूद उत्पादन को संभाला जा सकता है।
सितंबर में कैसी रहेगी बारिश?
मौसम विभाग के मुताबिक बंगाल की खाड़ी में बने कम दबाव वाले क्षेत्र के कारण पूर्वी भारत के कुछ राज्यों में बारिश की गतिविधियां बढ़ सकती हैं। पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के कई इलाकों में भारी बारिश की संभावना जताई गई है।
हालांकि, मॉनसून के दूसरे हिस्से यानी अगस्त-सितंबर के दौरान देश में सामान्य से कम बारिश रहने का अनुमान भी चिंता बढ़ा रहा है। प्रशांत महासागर में विकसित हो रही अल-नीनो परिस्थितियों को भी भारतीय मॉनसून के लिए चुनौती माना जा रहा है।
अब सितंबर की बारिश पर टिकी नजर
फिलहाल कम बुआई का आंकड़ा चिंता जरूर बढ़ाता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि खाद्यान्न संकट तय है। असली तस्वीर सितंबर की बारिश और फसलों की आगे होने वाली ग्रोथ पर निर्भर करेगी।
अगर सितंबर में पर्याप्त बारिश हुई तो धान समेत कई खरीफ फसलों को राहत मिल सकती है। लेकिन बारिश की कमी आगे भी जारी रही, तो फसल उत्पादन पर दबाव बढ़ने की आशंका है।
यानी आने वाले दिनों में किसानों के साथ-साथ कृषि विशेषज्ञों और सरकार की नजर भी सितंबर के मॉनसून पर टिकी हुई है। यही बारिश तय करेगी कि इस साल कमजोर मॉनसून का असर सिर्फ बुआई के आंकड़ों तक सीमित रहता है या फिर इसका प्रभाव देश के खाद्यान्न उत्पादन पर भी दिखाई देता है।