अमेरिका का $950 अरब का मास्टरप्लान: शेयर, बॉन्ड और डॉलर के निवेशकों और भारतीय बाजार पर असर
अमेरिकी ट्रेजरी यानी वहां का वित्त मंत्रालय बॉन्ड मार्केट में अपनी भूमिका बढ़ाने की तैयारी कर रहा है। लॉन्ग टर्म सरकारी बॉन्ड की बायबैक बढ़ाई जा रही है और करीब 950 अरब डॉलर वाले ट्रेजरी जनरल अकाउंट यानी TGA के इस्तेमाल पर भी विचार किया जा रहा है। दूसरी ओर, हेज फंड डॉलर के खिलाफ अपनी पोजिशन बढ़ा रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम का असर सिर्फ अमेरिकी बाजार तक सीमित नहीं रहेगा। इसका सीधा संबंध भारतीय शेयर बाजार, बॉन्ड यील्ड, विदेशी निवेश यानी FII फ्लो, सोने की कीमत और डॉलर के मुकाबले रुपये की चाल से भी हो सकता है।
सबसे पहले समझिए बॉन्ड यील्ड क्या होती है
मान लीजिए आपने 100 रुपये का सरकारी बॉन्ड खरीदा, जिस पर हर साल 5 रुपये ब्याज मिलता है। ऐसे में इसकी यील्ड करीब 5 फीसदी होगी।
अब अगर बाजार में इसी बॉन्ड की कीमत बढ़कर 110 रुपये हो जाए, लेकिन सालाना ब्याज 5 रुपये ही मिले, तो नए खरीदार के लिए यील्ड कम हो जाएगी।
यानी बॉन्ड की कीमत और यील्ड आमतौर पर एक-दूसरे के उलट दिशा में चलती हैं। बॉन्ड की कीमत बढ़ने पर यील्ड घटती है और कीमत गिरने पर यील्ड बढ़ती है।
अमेरिका में 30 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड हाल में 5.3 फीसदी से ऊपर पहुंच गई थी। इतनी ऊंची यील्ड का मतलब है कि अमेरिकी सरकार को नया कर्ज लेने के लिए ज्यादा ब्याज चुकाना पड़ रहा है। इसका असर होम लोन, कॉरपोरेट लोन और दूसरी ब्याज दरों पर भी पड़ सकता है।
अमेरिकी ट्रेजरी क्या करने जा रही है?
अमेरिकी ट्रेजरी ने 10 से 30 साल की अवधि वाले पुराने सरकारी बॉन्ड की बायबैक बढ़ाने का फैसला किया है। अभी एक ऑपरेशन में अधिकतम 2 अरब डॉलर के बॉन्ड खरीदे जाते थे। 9 सितंबर 2026 से यह रकम बढ़ाकर कम से कम 4 अरब डॉलर प्रति ऑपरेशन किए जाने की योजना है।
बॉन्ड बायबैक का सीधा मतलब है कि सरकार बाजार से अपने पुराने बॉन्ड वापस खरीदेगी। इससे बॉन्ड की मांग बढ़ सकती है, कीमत ऊपर जा सकती है और यील्ड पर नीचे आने का दबाव बन सकता है।
ट्रेजरी जिन पुराने बॉन्ड को खरीदना चाहती है, उनमें बड़ी संख्या ऑफ-द-रन सिक्योरिटीज की है। आसान भाषा में कहें तो ये सबसे नए जारी किए गए बॉन्ड नहीं हैं और इनमें ट्रेडिंग भी अपेक्षाकृत कम होती है।
ट्रेजरी का कहना है कि इस कदम से बॉन्ड मार्केट की लिक्विडिटी बेहतर हो सकती है। हालांकि, बाजार का एक हिस्सा इसे लॉन्ग टर्म यील्ड को नीचे लाने की कोशिश के तौर पर भी देख रहा है।
क्या है 950 अरब डॉलर वाला TGA?
ट्रेजरी जनरल अकाउंट यानी TGA को अमेरिकी सरकार का मुख्य बैंक अकाउंट समझ सकते हैं। यह अकाउंट फेडरल रिजर्व के पास रहता है। टैक्स से मिलने वाला पैसा और सरकार की ओर से कर्ज लेकर जुटाई गई रकम इसी खाते में रखी जाती है। सरकार अपने रोजमर्रा के खर्चों के लिए भी इसी खाते का इस्तेमाल करती है।
रिपोर्टों के मुताबिक, TGA में करीब 940 से 950 अरब डॉलर मौजूद हैं और ट्रेजरी इस रकम के एक हिस्से का इस्तेमाल बॉन्ड बायबैक के लिए करने पर विचार कर रही है। हालांकि, कितनी रकम और कब इस्तेमाल होगी, इसका अंतिम फैसला अभी स्पष्ट नहीं है।
अगर सरकार इसी जमा कैश से बॉन्ड खरीदती है, तो उसे तुरंत नए शॉर्ट टर्म बॉन्ड जारी करके पैसा जुटाने की जरूरत नहीं होगी। इससे कुछ समय के लिए बाजार में नकदी बढ़ सकती है और वित्तीय परिस्थितियां आसान हो सकती हैं।
लेकिन TGA का पैसा सीमित है। जब सरकार इस खाते का बैलेंस दोबारा बढ़ाएगी, तो उसे नए बॉन्ड जारी करने पड़ सकते हैं। ऐसे में बाजार से नकदी वापस निकल सकती है। इसलिए इसे स्थायी राहत के बजाय अस्थायी कदम के तौर पर देखना ज्यादा सही होगा।
क्या यह फेड की QE जैसी प्रक्रिया है?
पूरी तरह नहीं।
क्वांटिटेटिव ईजिंग यानी QE में फेडरल रिजर्व नया पैसा बनाकर बड़ी मात्रा में बॉन्ड खरीदता है। इससे वित्तीय सिस्टम में लिक्विडिटी बढ़ती है।
इसके विपरीत, अमेरिकी ट्रेजरी नया पैसा नहीं बना सकती। वह या तो TGA में मौजूद नकदी का इस्तेमाल करेगी या शॉर्ट टर्म डेट जारी करके लॉन्ग टर्म बॉन्ड खरीदेगी।
दूसरी स्थिति को ट्रेजरी की ओर से किए जाने वाले ऑपरेशन ट्विस्ट जैसा समझा जा सकता है। इसमें कुल कर्ज खत्म नहीं होता, बल्कि कर्ज की अवधि की संरचना में बदलाव आता है।
कुछ दावों में लॉन्ग डेटेड बॉन्ड जारी करना बंद करने की बात कही गई है, लेकिन इसकी स्पष्ट पुष्टि नहीं हुई है। ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट के मुताबिक नियमित डेट ऑक्शन जारी रहेंगे और इनमें लॉन्ग टर्म बॉन्ड भी शामिल हैं।
इसलिए सोशल मीडिया पर चल रही किसी भी हेडलाइन के आधार पर निवेश का फैसला करना उचित नहीं होगा।
यील्ड पर दबाव के बावजूद बॉन्ड क्यों नहीं संभल रहे?
इसकी सबसे बड़ी वजह अमेरिका का बढ़ता सरकारी कर्ज है। जब सरकार का खर्च उसकी आय से ज्यादा होता है, तो उसे नए बॉन्ड जारी करके पैसा जुटाना पड़ता है।
अगर बॉन्ड की सप्लाई ज्यादा हो और खरीदार सीमित हों, तो निवेशकों को आकर्षित करने के लिए सरकार को ज्यादा यील्ड देनी पड़ सकती है।
दूसरी बड़ी चिंता महंगाई है। अगर तेल की कीमत बढ़ती है या टैरिफ के कारण सामान महंगा होता है, तो निवेशक मान सकते हैं कि आने वाले वर्षों में डॉलर की खरीदारी क्षमता घट सकती है। इसके बदले वे लॉन्ग टर्म बॉन्ड पर ज्यादा यील्ड की मांग कर सकते हैं।
तीसरा मुद्दा फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति है। अगर महंगाई लंबे समय तक ऊंची रहती है तो फेड के लिए तेजी से रेट कट करना मुश्किल हो सकता है। हालांकि, अगर अमेरिकी अर्थव्यवस्था या रोजगार बाजार तेजी से कमजोर होता है, तो फेड को ब्याज दरें घटाने पर मजबूर होना पड़ सकता है।
अमेरिकी कर्ज की स्थिति कितनी गंभीर है?
फेडरल डेट हेल्ड बाय द पब्लिक से मतलब अमेरिकी सरकार के उस कर्ज से है, जिसे निवेशकों, बैंकों, कंपनियों, फेडरल रिजर्व और विदेशी सरकारों ने खरीद रखा है। इसमें कुछ सरकारी ट्रस्ट फंड की आंतरिक होल्डिंग शामिल नहीं होती।
कांग्रेसनल बजट ऑफिस यानी CBO के मुताबिक, 2026 में यह कर्ज अमेरिका की GDP के करीब 101 फीसदी तक पहुंच सकता है। 2036 तक इसके 120 फीसदी तक पहुंचने का अनुमान है।
CBO के अनुसार, सरकारी ब्याज भुगतान भी 2036 तक GDP के करीब 4.6 फीसदी तक पहुंच सकता है। इसका मतलब है कि सरकार के बजट पर ब्याज का बोझ लगातार बढ़ रहा है।
हालांकि, 2035 या 2036 में डेट-टू-GDP के 135 फीसदी तक पहुंचने की बात को आधिकारिक CBO अनुमान नहीं माना जाना चाहिए। यह एक स्ट्रेस सिनेरियो है, न कि पक्का पूर्वानुमान।
डॉलर के खिलाफ क्या कर रहे हैं हेज फंड?
मार्केट डेटा के मुताबिक डॉलर को लेकर निवेशकों का रुख कमजोर हुआ है। डॉलर के एक महीने के रिस्क रिवर्सल में गिरावट आई है, जिससे संकेत मिलता है कि कुछ ऑप्शन ट्रेडर्स डॉलर में कमजोरी की संभावना को लेकर ज्यादा सतर्क हैं।
रिस्क रिवर्सल को आसान भाषा में ऐसे समझें। करेंसी ट्रेडर्स डॉलर के ऊपर या नीचे जाने से बचाव और मुनाफे के लिए ऑप्शन खरीदते हैं। जब डॉलर गिरने पर फायदा देने वाले पुट ऑप्शन की मांग, डॉलर बढ़ने पर फायदा देने वाले कॉल ऑप्शन से ज्यादा हो जाती है, तो बाजार का झुकाव डॉलर की कमजोरी की तरफ माना जाता है।
हालांकि, ऑप्शन पोजिशनिंग भविष्य की गारंटी नहीं होती। युद्ध, आर्थिक संकट या किसी बड़े वित्तीय झटके की स्थिति में डॉलर फिर से सुरक्षित निवेश यानी सेफ हेवन बनकर मजबूत हो सकता है।
बॉन्ड निवेशकों के लिए क्या मतलब है?
अगर ट्रेजरी की बॉन्ड खरीदारी से यील्ड लगातार नीचे आती है, तो पहले से मौजूद लॉन्ग ड्यूरेशन बॉन्ड की कीमत बढ़ सकती है।
ड्यूरेशन का मतलब है कि ब्याज दरों में बदलाव होने पर बॉन्ड की कीमत कितनी तेजी से बदलती है। 20 या 30 साल की अवधि वाले बॉन्ड में यह उतार-चढ़ाव ज्यादा होता है।
लेकिन अगर कर्ज और महंगाई की चिंता फिर से हावी होती है, तो लॉन्ग टर्म यील्ड दोबारा बढ़ सकती है और बॉन्ड की कीमत गिर सकती है।
इसलिए केवल ऊंची यील्ड देखकर लॉन्ग टर्म बॉन्ड में पूरा पैसा एक साथ लगाना जोखिम भरा हो सकता है। शॉर्ट ड्यूरेशन बॉन्ड में कीमतों का उतार-चढ़ाव आमतौर पर कम होता है, जबकि लॉन्ग ड्यूरेशन बॉन्ड में संभावित फायदा और जोखिम दोनों ज्यादा होते हैं।
भारतीय शेयर बाजार पर क्या असर पड़ेगा?
अगर अमेरिकी बॉन्ड यील्ड नीचे आती है, तो टेक्नोलॉजी, ग्रोथ कंपनियों, रियल एस्टेट और ज्यादा कर्ज वाली कंपनियों को फायदा मिल सकता है। कम यील्ड के कारण भविष्य की कमाई का वर्तमान मूल्य बढ़ सकता है।
वहीं, अगर अमेरिकी यील्ड लंबे समय तक ऊंची रहती है तो निवेशक शेयर बाजार के बजाय सरकारी बॉन्ड जैसे अपेक्षाकृत सुरक्षित विकल्पों की ओर पैसा ले जा सकते हैं। इससे खासकर महंगे वैल्यूएशन वाले शेयरों पर दबाव बन सकता है।
बैंकिंग शेयरों पर असर मिला-जुला हो सकता है। ऊंची ब्याज दरों से लोन पर कमाई बढ़ सकती है, लेकिन महंगा फंड, कमजोर क्रेडिट डिमांड और बॉन्ड पोर्टफोलियो में संभावित नुकसान दबाव बना सकते हैं।
भारतीय निवेशकों के लिए डॉलर-रुपये का हिसाब
अगर डॉलर कमजोर होता है तो भारत जैसे उभरते बाजारों में विदेशी निवेश बढ़ने की संभावना बन सकती है। इससे भारतीय शेयर बाजार, बॉन्ड और रुपये को सपोर्ट मिल सकता है।
हालांकि, डॉलर इंडेक्स कमजोर होने का मतलब यह नहीं है कि रुपया हर बार मजबूत ही होगा। भारत में कच्चे तेल की कीमत बढ़ी, FII ने बिकवाली की या रिजर्व बैंक ने डॉलर खरीदा, तो रुपये पर दबाव बना रह सकता है।
अमेरिकी शेयरों में निवेश करने वाले भारतीय निवेशकों को करेंसी रिटर्न भी ध्यान में रखना चाहिए। उदाहरण के लिए, अगर अमेरिकी शेयर 10 फीसदी बढ़ा लेकिन डॉलर रुपये के मुकाबले 5 फीसदी कमजोर हो गया, तो रुपये में निवेशक का रिटर्न करीब 4.5 फीसदी रह जाएगा।
आखिर भारत और दुनिया के लिए क्या मायने रखता है?
अमेरिकी ट्रेजरी की बॉन्ड बायबैक से कुछ समय के लिए लॉन्ग टर्म यील्ड पर दबाव कम हो सकता है। लेकिन इससे अमेरिका के बढ़ते कर्ज, बजट घाटे और महंगाई की मूल समस्या खत्म नहीं होगी।
भारतीय निवेशकों के लिए आने वाले समय में अमेरिकी 30 साल की बॉन्ड यील्ड, अमेरिकी महंगाई, फेड की ब्याज दर नीति, TGA में बदलाव, तेल की कीमत, डॉलर इंडेक्स और FII फ्लो बेहद महत्वपूर्ण संकेतक रहेंगे।
अगर अमेरिकी यील्ड नीचे आती है और डॉलर कमजोर रहता है, तो भारतीय शेयर बाजार, बॉन्ड और सोने को सपोर्ट मिल सकता है। लेकिन अगर महंगाई और अमेरिकी कर्ज की चिंता फिर हावी हुई, तो यील्ड और डॉलर दोनों में तेजी लौट सकती है, जिसका असर ग्लोबल मार्केट के साथ भारत पर भी देखने को मिलेगा।