डॉलर के मुकाबले टूटते रुपये को बचाने RBI का बड़ा एक्शन: फॉरेक्स रूल्स किए सख्त, सरकारी तेल कंपनियों को दी राहत
डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर होते भारतीय रुपये को संभालने और विदेशी मुद्रा बाजार में बढ़ते उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने कई अहम कदम उठाए हैं। रिजर्व बैंक ने सरकारी तेल कंपनियों की डॉलर संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए स्पेशल डॉलर विंडो शुरू की है। इसके साथ ही फॉरेक्स डेरिवेटिव्स में होने वाली सट्टेबाजी पर लगाम लगाने के लिए नियम भी सख्त किए गए हैं।
बाजार के जानकारों का मानना है कि इन उपायों से रुपये पर पड़ रहे दबाव को कुछ राहत मिल सकती है और बाजार में अचानक होने वाले उतार-चढ़ाव को कम किया जा सकता है। हालांकि, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, मजबूत अमेरिकी डॉलर और विदेशी निवेश में सुस्ती जैसी चुनौतियां बनी रहने पर रुपये की गिरावट को पूरी तरह रोकना आसान नहीं होगा।
2026 में अब तक 7% से ज्यादा कमजोर हुआ रुपया
दिए गए बाजार आंकड़ों के मुताबिक, शुक्रवार 9 अक्टूबर को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 96.73 के स्तर पर बंद हुआ। यह मई में दर्ज 96.96 के कथित रिकॉर्ड निचले स्तर के काफी करीब था।
कैलेंडर वर्ष 2026 में अब तक रुपये में 7% से ज्यादा की गिरावट बताई गई है, जबकि चालू वित्त वर्ष 2026-27 में यह करीब 3.5% कमजोर हुआ है।
रुपये पर दबाव बढ़ने के पीछे कई वजहें हैं। भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक है। तेल महंगा होने पर आयात के भुगतान के लिए ज्यादा डॉलर की जरूरत पड़ती है। इसके अलावा अमेरिकी डॉलर की मजबूती और विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी रुपये को कमजोर कर सकती है।
RBI की नजर 97 रुपये प्रति डॉलर के स्तर पर
रुपये के 97 प्रति डॉलर के स्तर के करीब पहुंचने से बाजार में चिंता बढ़ सकती है। अगर कंपनियों और कारोबारियों को लगता है कि रुपया और कमजोर होगा, तो वे पहले से ज्यादा डॉलर खरीदने की कोशिश कर सकते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ सकती है और रुपये पर दबाव और गहरा सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, रुपये में तेज गिरावट को नियंत्रित करने के लिए सरकारी बैंकों के माध्यम से डॉलर की बिक्री भी की जा रही है। हालांकि, विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये का वास्तविक स्तर कई घरेलू और वैश्विक कारकों पर निर्भर करता है।
तेल कंपनियों के लिए स्पेशल डॉलर विंडो क्या है?
भारत के कुल आयात में कच्चे तेल की हिस्सेदारी काफी महत्वपूर्ण है। तेल कंपनियों को विदेश से कच्चा तेल खरीदने के लिए बड़ी मात्रा में डॉलर की जरूरत होती है। आमतौर पर इस मांग का एक हिस्सा स्पॉट फॉरेक्स मार्केट से पूरा किया जाता है।
नई व्यवस्था के तहत सरकारी तेल कंपनियों की रोजाना डॉलर संबंधी जरूरतों को एक विशेष विंडो के जरिए पूरा करने का प्रावधान बताया गया है। इसका उद्देश्य तेल कंपनियों की डॉलर मांग का दबाव खुले बाजार से हटाना है।
इससे स्पॉट मार्केट में डॉलर खरीदने की जरूरत कम हो सकती है और रुपये में अचानक होने वाले उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इससे देश की कुल डॉलर जरूरत खत्म नहीं होगी, बल्कि डॉलर की उपलब्धता और खरीद के तरीके में बदलाव होगा।
फॉरेक्स डेरिवेटिव्स पर सख्ती क्यों?
RBI ने विदेशी मुद्रा से जुड़े डेरिवेटिव्स कारोबार में ऐसे सौदों को नियंत्रित करने के लिए नियम सख्त किए हैं, जिनके पीछे वास्तविक कारोबारी जरूरत या विदेशी मुद्रा का जोखिम मौजूद नहीं होता।
फॉरेक्स डेरिवेटिव्स का इस्तेमाल आमतौर पर आयातकों, निर्यातकों और कंपनियों द्वारा भविष्य में मुद्रा की कीमत बदलने से होने वाले नुकसान से बचने के लिए किया जाता है। इसे हेजिंग कहा जाता है। लेकिन इन साधनों का इस्तेमाल मुद्रा की कीमतों पर दांव लगाने के लिए भी हो सकता है।
नियमों का उद्देश्य वास्तविक कारोबारी जरूरतों के लिए हेजिंग की सुविधा बनाए रखते हुए अत्यधिक सट्टेबाजी और बाजार में अस्थिरता को कम करना है।
फॉरेक्स डेरिवेटिव्स के नियमों में बताए गए 4 बड़े बदलाव
1. बिना वास्तविक जोखिम के बड़े सौदों की सीमा में कटौती
रिपोर्ट के मुताबिक, बिना वास्तविक विदेशी मुद्रा लेन-देन या संबंधित दस्तावेजों के किए जाने वाले सौदों की सीमा 100 मिलियन डॉलर से घटाकर 5 मिलियन डॉलर कर दी गई है। इसका उद्देश्य बिना वास्तविक कारोबारी जरूरत के बड़े दांव लगाने की गुंजाइश कम करना है। यह सीमा किन उत्पादों और किन परिस्थितियों पर लागू होती है, इसकी पुष्टि आधिकारिक RBI निर्देश से की जानी चाहिए।
2. रद्द किए गए सौदे को दोबारा बुक करने पर रोक
बताए गए नियमों के अनुसार, फॉरेक्स डेरिवेटिव्स का सौदा रद्द करने के बाद उसे दोबारा बुक करने पर पाबंदी होगी। हालांकि, मैच्योरिटी के समय सौदे को आगे बढ़ाने यानी रोलओवर के नियम अलग हो सकते हैं। इसका मकसद बाजार की परिस्थितियों के अनुसार बार-बार सौदे बदलने से पैदा होने वाली सट्टेबाजी को सीमित करना है।
3. बड़े लेन-देन पर अतिरिक्त जोखिम सुरक्षा
रिपोर्ट में 20 मिलियन डॉलर से बड़े सौदों पर 20% फॉरेन एक्सचेंज रिस्क रिजर्व (FERR) रखने की शर्त का जिक्र है। इसका उद्देश्य बड़े विदेशी मुद्रा जोखिम से जुड़े सौदों के लिए अतिरिक्त सुरक्षा सुनिश्चित करना बताया गया है। इस प्रावधान की सटीक शर्तों और लागू होने की तारीख की आधिकारिक पुष्टि जरूरी है।
4. एक ही लेन-देन पर दो बार हेजिंग लेने से रोक
कारोबारियों को यह घोषणा करनी पड़ सकती है कि एक ही विदेशी मुद्रा लेन-देन के जोखिम को दिखाकर अलग-अलग बैंकों से दोहरी हेजिंग नहीं ली गई है। इससे एक ही बिल या कारोबार के आधार पर जरूरत से ज्यादा हेजिंग लेने की संभावना कम हो सकती है।
दो हफ्तों में विदेशी मुद्रा भंडार में बड़ी गिरावट का दावा
रुपये पर दबाव के बीच भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में भी गिरावट के आंकड़े सामने आए हैं। दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, 25 सितंबर को समाप्त सप्ताह में भंडार 18.34 अरब डॉलर घटकर 757.46 अरब डॉलर रह गया। इसके बाद 2 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में इसमें 12.95 अरब डॉलर की और कमी बताई गई, जिससे यह 734.61 अरब डॉलर पर आ गया।
इस तरह दो सप्ताह में कुल 31.29 अरब डॉलर की गिरावट का दावा किया गया है। सितंबर की शुरुआत में बताए गए 785.7 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर से तुलना करें, तो गिरावट और भी स्पष्ट दिखाई देती है।
हालांकि, विदेशी मुद्रा भंडार में कमी का मतलब हमेशा यह नहीं होता कि पूरा पैसा रुपये को संभालने में खर्च हुआ है। डॉलर की दूसरी मुद्राओं के मुकाबले कीमतों में बदलाव, सोने के मूल्यांकन और अन्य कारकों से भी भंडार के आंकड़े प्रभावित हो सकते हैं।
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा के REER संबंधी कथित बयान का आशय यह है कि रुपये की मजबूती का आकलन सिर्फ डॉलर के मुकाबले उसके भाव से नहीं, बल्कि व्यापारिक साझेदार देशों की मुद्राओं और महंगाई के अंतर को ध्यान में रखकर भी किया जाना चाहिए।
RBI ₹25,000 करोड़ के सरकारी बॉन्ड बेचने की तैयारी में
बाजार में नकदी की उपलब्धता नियंत्रित करने के लिए सरकारी बॉन्ड की खरीद-बिक्री भी एक अहम मौद्रिक साधन है। रिपोर्ट में बताया गया है कि RBI 13 अक्टूबर को ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) के तहत 25,000 करोड़ रुपये के सरकारी बॉन्ड बेचने वाला है।
जब RBI बाजार में सरकारी बॉन्ड बेचता है, तो बैंक और अन्य खरीदार इनके बदले भुगतान करते हैं। इससे बैंकिंग प्रणाली में उपलब्ध नकदी घट सकती है। नकदी की स्थिति और मांग के आधार पर बॉन्ड की यील्ड पर भी असर पड़ सकता है।
हालांकि, बॉन्ड यील्ड में कितनी बढ़ोतरी होगी, यह पहले से निश्चित नहीं कहा जा सकता। इसका असर बाजार की मांग, सरकारी उधारी और अन्य आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
CRR के दैनिक नियमों में बदलाव से बैंकों पर क्या असर पड़ेगा?
रिपोर्ट के अनुसार, 16 अक्टूबर से बैंकों को अपने निर्धारित कैश रिजर्व रेश्यो (CRR) का कम से कम 99% हिस्सा रोजाना बनाए रखना होगा, जबकि पहले दैनिक न्यूनतम सीमा 90% बताई गई है।
CRR वह हिस्सा है, जिसे बैंकों को अपनी निर्धारित शुद्ध मांग और समय देनदारियों के अनुपात में RBI के पास नकद रखना होता है। इसका इस्तेमाल बैंकिंग प्रणाली में नकदी की स्थिति को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है।
दैनिक न्यूनतम सीमा बढ़ने पर बैंकों को अपनी नकदी का अधिक सावधानी से प्रबंधन करना पड़ सकता है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि CRR की मूल दर अपने आप बढ़ गई है। यहां बदलाव रोजाना निर्धारित रिजर्व बनाए रखने की सीमा में बताया गया है।
OMO, CRR और REER को आसान भाषा में समझें
1. OMO सेल: बाजार से नकदी निकालने का तरीका
जब RBI सरकारी बॉन्ड बेचता है, तो खरीदारों से भुगतान लेकर बैंकिंग प्रणाली की अतिरिक्त नकदी कम कर सकता है। इससे ब्याज दरों और बॉन्ड यील्ड पर असर पड़ सकता है।
आम लोगों पर असर: बैंकिंग प्रणाली में नकदी की कमी होने पर कर्ज की ब्याज दरों पर दबाव आ सकता है, लेकिन इसका असर तुरंत या एक जैसा होना जरूरी नहीं है। महंगाई पर प्रभाव भी कई अन्य कारकों पर निर्भर करता है।
2. CRR: बैंकों के लिए जरूरी नकदी रिजर्व
CRR के तहत बैंकों को अपनी निर्धारित जमा देनदारियों के अनुपात में एक हिस्सा RBI के पास रखना होता है। इससे केंद्रीय बैंक बैंकिंग प्रणाली में नकदी की उपलब्धता को प्रभावित कर सकता है।
आम लोगों पर असर: CRR से जुड़ी सख्ती बैंक की नकदी प्रबंधन व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है। लेकिन इससे होम लोन, पर्सनल लोन या FD की ब्याज दरें तुरंत बदलेंगी, ऐसा जरूरी नहीं है।
3. REER: रुपये की वास्तविक प्रतिस्पर्धी स्थिति का पैमाना
रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट यानी REER ऐसा सूचकांक है, जो भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदार देशों की मुद्राओं के मुकाबले रुपये की स्थिति को महंगाई के अंतर के साथ समझने में मदद करता है।
आम लोगों और कारोबार पर असर: रुपये की कमजोरी से पेट्रोलियम, इलेक्ट्रॉनिक्स और विदेश से आने वाली दूसरी वस्तुओं का आयात महंगा हो सकता है। वहीं, कमजोर रुपया कुछ निर्यातकों को फायदा दे सकता है, हालांकि उनका वास्तविक लाभ उत्पादन लागत और विदेशी मांग पर भी निर्भर करता है।
आम आदमी की जेब पर क्या पड़ सकता है असर?
रुपये में लगातार कमजोरी और डॉलर की मजबूती का असर कई क्षेत्रों में देखने को मिल सकता है।
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पेट्रोल-डीजल: कच्चा तेल महंगा रहने और रुपया कमजोर होने पर आयात लागत बढ़ सकती है। हालांकि, घरेलू ईंधन कीमतों पर कर, सरकारी नीतियों और दूसरी लागतों का भी असर होता है।
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विदेश में पढ़ाई: डॉलर में फीस देने वाले विद्यार्थियों और उनके परिवारों को अधिक रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं।
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विदेश यात्रा: होटल, टिकट और अन्य डॉलर आधारित खर्च महंगे पड़ सकते हैं।
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इलेक्ट्रॉनिक्स और आयातित सामान: विदेश से आने वाले उत्पादों की लागत बढ़ सकती है, जिसका असर कीमतों पर पड़ सकता है।
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निर्यातक कंपनियां: डॉलर में कमाई करने वाली कुछ कंपनियों को रुपये में भुगतान मिलने पर फायदा हो सकता है, लेकिन यह उनकी लागत और कारोबारी स्थिति पर निर्भर करेगा।
क्या RBI के फैसलों से रुपये की गिरावट रुक जाएगी?
RBI के कदमों का तात्कालिक उद्देश्य बाजार में डॉलर की मांग का दबाव कम करना, अत्यधिक सट्टेबाजी को नियंत्रित करना और नकदी की स्थिति को व्यवस्थित करना है। इन उपायों से रुपये की चाल में स्थिरता आ सकती है, लेकिन लंबी अवधि की दिशा कई आर्थिक कारकों पर निर्भर करेगी।
कच्चे तेल की कीमतें, अमेरिकी डॉलर की मजबूती, विदेशी निवेशकों का रुख, भारत का आयात-निर्यात संतुलन और वैश्विक ब्याज दरें रुपये को प्रभावित करती रहेंगी।