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RBI Action on Rupee: रुपये की गिरावट थामने के लिए RBI के कदम, डॉलर की मांग और सट्टेबाजी पर लग सकती है लगाम

 

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रुपये में उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने और विदेशी मुद्रा बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए कुछ अहम कदम उठाए हैं। इन उपायों से निकट अवधि में रुपये पर गिरावट का दबाव कम होने और बैंकिंग सिस्टम से अतिरिक्त नकदी निकालने में मदद मिलने की उम्मीद जताई गई है। विभिन्न शोध रिपोर्टों के मुताबिक, इन कदमों का असर डॉलर की मांग और विदेशी मुद्रा बाजार में होने वाले सौदों पर पड़ सकता है।

डॉलर की मांग कम करने पर RBI का जोर

RBI के कदमों में ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को नामित बैंकों के माध्यम से डॉलर उपलब्ध कराने की विशेष व्यवस्था और विदेशी मुद्रा में उतार-चढ़ाव से बचाव करने वाले कुछ सौदों की लागत बढ़ाना शामिल है।

इन उपायों का उद्देश्य हाजिर बाजार में डॉलर की मांग को नियंत्रित करना और रुपये के मुकाबले डॉलर की चाल पर दांव लगाने वाली गतिविधियों को सीमित करना है। इससे विदेशी मुद्रा बाजार में अस्थिरता कम करने में मदद मिल सकती है।

रुपये में सुधार की उम्मीद, लेकिन वैश्विक जोखिम बरकरार

कोटक महिंद्रा बैंक की एक शोध रिपोर्ट के अनुसार, RBI के इन कदमों का रुपये पर निकट अवधि में सकारात्मक असर पड़ सकता है। रिपोर्ट में डॉलर के मुकाबले रुपये के 95 के स्तर से नीचे आने की संभावना से भी इनकार नहीं किया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, ऑयल मार्केटिंग कंपनियों और अन्य आयातकों की ओर से विदेशी मुद्रा जोखिम से बचाव के सौदों पर अंकुश लगने से वायदा बाजार में प्रीमियम कम हो सकता है।

हालांकि, वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनिश्चितता के कारण रुपये की दिशा को लेकर जोखिम बने हुए हैं। इसलिए RBI के कदमों से स्थायी राहत मिलेगी या नहीं, यह आने वाले समय में बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

RBI ने क्यों उठाए ये कदम?

रिजर्व बैंक का कहना है कि इन उपायों का उद्देश्य विदेशी मुद्रा बाजार में अनुशासन मजबूत करना और जोखिम का उचित प्रबंधन सुनिश्चित करना है। केंद्रीय बैंक चाहता है कि बाजार में लेनदेन व्यवस्थित और पारदर्शी तरीके से हो तथा रुपये में अचानक होने वाले उतार-चढ़ाव को नियंत्रित किया जा सके।

आम लोगों और कारोबार पर क्या पड़ सकता है असर?

रुपये में स्थिरता आने से आयातकों और विदेशी मुद्रा में भुगतान करने वाली कंपनियों को अनिश्चितता से कुछ राहत मिल सकती है। कच्चे तेल जैसे आयात पर निर्भर क्षेत्रों के लिए विनिमय दर में बदलाव महत्वपूर्ण होता है। वहीं, रुपये की कमजोरी से आयात महंगा होने और कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका रहती है।

हालांकि, इन उपायों का पेट्रोल-डीजल, महंगाई या आम लोगों के खर्च पर तत्काल कितना असर पड़ेगा, यह अभी निश्चित नहीं कहा जा सकता। इसका प्रभाव रुपये की चाल, अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों और वैश्विक आर्थिक हालात पर भी निर्भर करेगा।