×

Mughal Empire Economy: मुगल साम्राज्य इतना अमीर कैसे था? खेती से विदेशी व्यापार तक, ऐसे भरता था शाही खजाना
 

 

मुगल साम्राज्य के इतिहास में अकबर, जहांगीर और शाहजहां जैसे शासकों का दौर केवल स्थापत्य और राजनीतिक विस्तार के लिए ही नहीं, बल्कि मजबूत आर्थिक व्यवस्था के लिए भी जाना जाता है। ऐतिहासिक आर्थिक अनुमानों के अनुसार मुगलकालीन भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रखता था। साम्राज्य की आर्थिक ताकत के पीछे कृषि, भू-राजस्व, घरेलू कारोबार, हस्तशिल्प और विदेशी व्यापार जैसे कई स्रोत थे।
शाहजहां के शासनकाल के लिए उपलब्ध ऐतिहासिक अनुमानों में वार्षिक शाही राजस्व 22 करोड़ रुपये से अधिक बताया जाता है। अगर उस दौर की इस राशि को केवल 365 दिनों में बांटकर देखा जाए तो यह औसतन करीब 6 लाख रुपये प्रतिदिन बैठती है। हालांकि, यह गणना केवल ऐतिहासिक मुद्रा के आधार पर है। इसे आज के 6 लाख रुपये के बराबर मानना सही नहीं होगा, क्योंकि उस समय रुपये की क्रय शक्ति और मौद्रिक व्यवस्था आज से बिल्कुल अलग थी।
खेती थी शाही आय की सबसे बड़ी नींव
मुगल अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण आधार कृषि थी। उस समय बड़ी आबादी खेती और उससे जुड़े कामों पर निर्भर थी। इसलिए राज्य की आमदनी में भू-राजस्व की बड़ी भूमिका थी।
अकबर के शासनकाल में उनके राजस्व मंत्री राजा टोडर मल ने राजस्व व्यवस्था को व्यवस्थित करने के लिए कई सुधार किए। इनमें दहसाला प्रणाली प्रमुख थी। इसमें पिछले 10 वर्षों के औसत उत्पादन और कीमतों को ध्यान में रखकर भूमि राजस्व निर्धारित करने की व्यवस्था की गई थी।
इस व्यवस्था का उद्देश्य राजस्व निर्धारण को अधिक व्यवस्थित बनाना था। अलग-अलग इलाकों, फसलों और परिस्थितियों के आधार पर राज्य का हिस्सा अलग हो सकता था। राजस्व नकद या उपज के रूप में लिया जा सकता था।
विदेशी व्यापार से भारत में आती थी कीमती धातु
मुगल भारत की आर्थिक ताकत केवल खेती पर निर्भर नहीं थी। देश में कपड़ा निर्माण, हस्तशिल्प और कई तरह के उत्पादन का बड़ा आधार मौजूद था। भारतीय वस्तुओं की मांग विदेशी बाजारों में भी थी।
सूती कपड़े, बंगाल की मलमल, रेशम, मसाले, नील, चीनी और शोरा जैसे उत्पादों का व्यापार विभिन्न विदेशी बाजारों में होता था। यूरोप, पश्चिम एशिया और एशिया के दूसरे हिस्सों से व्यापारी भारतीय वस्तुएं खरीदते थे।
भारत से बड़ी मात्रा में सामान बाहर जाने के बदले सोना और चांदी जैसी कीमती धातुएं भी देश में आती थीं। इस व्यापार ने भारतीय अर्थव्यवस्था में मुद्रा और संपत्ति के प्रवाह को मजबूत करने में भूमिका निभाई।
जजिया से लेकर सीमा शुल्क तक कई तरह के टैक्स
मुगल शासन में राजस्व जुटाने के लिए सिर्फ कृषि कर ही नहीं था। अलग-अलग समय और शासकों के दौरान विभिन्न प्रकार के कर और शुल्क वसूले जाते थे।
जजिया इनमें सबसे चर्चित करों में से एक था। अकबर ने इसे समाप्त कर दिया था, जबकि औरंगजेब के शासनकाल में इसे दोबारा लागू किया गया। इसके अलावा व्यापारियों से सीमा शुल्क और माल की आवाजाही पर विभिन्न प्रकार के शुल्क भी लिए जाते थे।
सड़क, नदी और बंदरगाहों के रास्ते होने वाले व्यापार पर लगने वाले शुल्क भी राज्य के राजस्व में योगदान करते थे। इस तरह शाही खजाने की आय कई अलग-अलग स्रोतों से आती थी।


उस समय '6 लाख रुपये रोज' का क्या मतलब था?
शाहजहां के समय के वार्षिक राजस्व का अनुमान 22 करोड़ रुपये से अधिक बताया जाता है। इसी राशि को 365 दिनों से विभाजित करने पर करीब 6 लाख रुपये प्रतिदिन का आंकड़ा निकलता है।
लेकिन इस आंकड़े को समझते समय एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है। 17वीं शताब्दी का रुपया आज के रुपये जैसा नहीं था। उस समय की मुद्रा मुख्य रूप से चांदी और अन्य धातुओं पर आधारित थी और उसकी क्रय शक्ति वर्तमान मुद्रा से अलग थी।
इसलिए यह कहना कि मुगल शासक आज के हिसाब से रोज 6 लाख रुपये कमाते थे, ऐतिहासिक रूप से सही तुलना नहीं होगी। यह आंकड़ा उस समय की मुद्रा में अनुमानित औसत दैनिक राजस्व को दर्शाता है।
मुगल साम्राज्य की आर्थिक ताकत का राज क्या था?
मुगल साम्राज्य की आर्थिक व्यवस्था किसी एक आय के स्रोत पर निर्भर नहीं थी। कृषि और भू-राजस्व ने सरकार को बड़ा नियमित राजस्व दिया, जबकि हस्तशिल्प और व्यापार ने अर्थव्यवस्था को घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ा।
किसान, जमींदार, कारीगर, व्यापारी और बंदरगाह—ये सभी आर्थिक व्यवस्था के अलग-अलग हिस्से थे। कृषि उत्पादन से लेकर बाजारों और विदेशी व्यापार तक एक व्यापक आर्थिक नेटवर्क काम करता था।
यही वजह है कि मुगलकालीन भारत को समझने के लिए केवल शाही खजाने या महल की संपत्ति को देखना पर्याप्त नहीं है। उस दौर की आर्थिक शक्ति के पीछे विशाल कृषि व्यवस्था, उत्पादन, व्यापारिक नेटवर्क और कर संग्रह की पूरी प्रणाली काम करती थी।