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झज्जर की महिला ने ऑर्गेनिक घी के कारोबार से बनाई अलग पहचान, 3 करोड़ पहुँचा सालाना टर्नओवर

 

कहते हैं कि अगर इंसान के हौसले बुलंद हों, तो मुश्किल से मुश्किल हालात भी उसके सामने टिक नहीं पाते. हरियाणा के झज्जर जिले के खरमान गांव की रहने वाली रेणू सांगवान की कहानी इसकी मिसाल है. एक किसान परिवार में जन्मीं रेणू का बचपन से ही मिट्टी और पशुओं से जुड़ाव रहा. साल 2016-17 में उन्होंने अपने पति कृष्ण पहलवान के साथ मिलकर महज 9 देसी गायों से 'गोकुल फार्म श्रीकृष्ण गोधाम' की शुरुआत की थी. आज यही फार्म बड़े स्तर पर डेयरी कारोबार कर रहा है.

पति की मौत के बाद नहीं मानी हार

रेणू सांगवान की जिंदगी में साल 2018 में बड़ा बदलाव आया, जब उनके पति कृष्ण पहलवान का अचानक निधन हो गया. यह उनके लिए बेहद मुश्किल दौर था, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी. पति के सपने को आगे बढ़ाने का फैसला करते हुए रेणू ने खुद वेटरनरी का कोर्स किया और पशुपालन से जुड़ी बारीकियां सीखीं.

इसके बाद उन्होंने अपने बेटे डॉ. विनय सांगवान के साथ मिलकर डेयरी फार्म को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी संभाली. धीरे-धीरे दोनों ने फार्म का विस्तार किया और इसे एक बड़े डेयरी कारोबार में बदल दिया.

लोगों ने ताने मारे, बेटे ने दिया साथ

पति के निधन के बाद जब रेणू ने पशुपालन की जिम्मेदारी संभाली, तो उन्हें समाज के तानों का भी सामना करना पड़ा. कई लोगों ने उनकी हिम्मत तोड़ने की कोशिश की. लेकिन रेणू ने किसी की बात की परवाह नहीं की.

उनका बेटा डॉ. विनय सांगवान भी इस मुश्किल समय में मां के साथ मजबूती से खड़ा रहा. मां-बेटे की मेहनत का नतीजा यह हुआ कि जिस गांव में कभी लोग उन्हें ताने देते थे, आज वहीं उनके 'गोकुल फार्म' को सम्मान की नजर से देखा जाता है.

9 गायों से 280 से ज्यादा गायों तक पहुंचा फार्म

शुरुआत में फार्म में सिर्फ 9 देसी गायें थीं, लेकिन आज यहां 280 से ज्यादा गायें हैं. इनमें साहीवाल, गिर, राठी, थारपारकर और हरियाणवी जैसी देसी नस्लें शामिल हैं.

फार्म से रोजाना 800 लीटर से ज्यादा दूध का उत्पादन होता है. इस दूध की दिल्ली और गुरुग्राम में घरों तक सप्लाई की जाती है. रिपोर्ट के मुताबिक, दूध करीब 120 रुपये प्रति लीटर की कीमत पर बेचा जाता है.

वैदिक तरीके से तैयार घी की विदेशों में मांग

डेयरी फार्म की कमाई सिर्फ दूध तक सीमित नहीं है. यहां पारंपरिक 'बिलोना पद्धति' से देसी घी भी तैयार किया जाता है. यह घी करीब 3,500 रुपये प्रति किलो तक की कीमत पर बिकता है.

अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, इंग्लैंड और फिलीपींस समेत कई देशों में इस घी की मांग बताई जाती है. इसके अलावा फार्म में पनीर, बर्फी और च्यवनप्राश जैसे उत्पाद भी तैयार किए जाते हैं. वित्त वर्ष 2023-24 के आंकड़ों के मुताबिक, फार्म ने 3 करोड़ रुपये से ज्यादा का टर्नओवर हासिल किया.

देसी नस्ल और आधुनिक तकनीक का मेल

रेणू सांगवान और उनके बेटे ने पारंपरिक पशुपालन के साथ आधुनिक तकनीक को भी अपनाया है. फार्म में ऑटोमैटिक मिल्किंग मशीनों के साथ आधुनिक सफाई व्यवस्था का इस्तेमाल किया जाता है.

नस्ल सुधार के लिए देसी सांडों का सीमेन भी तैयार किया जाता है, ताकि दूसरे किसान भी अपने पशुओं की नस्ल और गुणवत्ता में सुधार कर सकें. डॉ. विनय सांगवान के मुताबिक, उनका उद्देश्य देसी नस्लों की परंपरा को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ना है, जिससे पशुओं की सेहत बेहतर रहे और किसानों का काम भी आसान हो.

कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुकी हैं रेणू

रेणू सांगवान की मेहनत को राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली है. वह कई प्रदर्शनियों में पुरस्कार हासिल कर चुकी हैं. उन्हें राष्ट्रीय गोपाल रत्न अवॉर्ड 2024 और मिलेनियर फार्मर्स ऑफ इंडिया (MFOI) अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया है.

रेणू का कहना है कि परिस्थितियां कितनी भी मुश्किल क्यों न हों, इंसान को हिम्मत नहीं हारनी चाहिए. उनका मानना है कि सही सोच, मेहनत और मजबूत इरादों के दम पर कोई भी व्यक्ति अपनी जिंदगी बदल सकता है.