☰
×

क्या ईंधन बाजार में आने वाला है बड़ा भूचाल? दुनिया भर में डीजल की किल्लत और महंगे दामों का अलर्ट

 

दुनियाभर में डीजल की सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ गई है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) की मासिक ऑयल मार्केट रिपोर्ट के मुताबिक, अगर मौजूदा हालात में सुधार नहीं होता है, तो डीजल की कमी का संकट 2027 तक बना रह सकता है। रिपोर्ट में बताया गया है कि जिस समय आमतौर पर दुनिया के कई हिस्सों में डीजल का स्टॉक बढ़ना चाहिए, उस दौरान भंडार में गिरावट देखी जा रही है। इससे आने वाले महीनों में मांग के मुकाबले सप्लाई कम पड़ने और कीमतों पर दबाव बढ़ने का खतरा है।

डीजल की कमी का असर केवल परिवहन क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। ट्रक, मालवाहक जहाज, कृषि उपकरण और कई औद्योगिक गतिविधियां डीजल पर निर्भर हैं। ऐसे में यदि वैश्विक बाजार में सप्लाई लंबे समय तक प्रभावित रहती है, तो माल ढुलाई और उत्पादन की लागत भी बढ़ सकती है।

डिमांड और सप्लाई के बीच बिगड़ रहा संतुलन

पेरिस स्थित अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की रिपोर्ट में डीजल के घटते भंडार को लेकर चिंता जताई गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, रिफाइनरियां साल के अंत तक उत्पादन बढ़ाने की कोशिश कर सकती हैं, लेकिन इससे बाजार में सप्लाई की समस्या तुरंत दूर होने की गारंटी नहीं है।

इसकी एक बड़ी वजह पश्चिम एशिया से रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों की सप्लाई में रुकावट है। यदि मध्य पूर्व से डीजल और अन्य ईंधनों का निर्यात सामान्य स्तर पर नहीं लौटता, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग और उपलब्धता के बीच संतुलन बनाना मुश्किल हो सकता है।

डीजल के स्टॉक में लगातार गिरावट आने से कंपनियों और देशों को अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। इसका असर अंतरराष्ट्रीय ईंधन बाजार के साथ-साथ परिवहन और उद्योगों पर भी पड़ सकता है।

यूरोप, अमेरिका और सिंगापुर में डीजल की कीमतों में उछाल

रिपोर्ट में वैश्विक डीजल बाजार में कीमतों में तेज उछाल का भी उल्लेख किया गया है। यूरोप और अमेरिका में डीजल की थोक कीमतें बढ़कर लगभग 220 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने की बात कही गई है। वहीं, सिंगापुर के बाजार में भी कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने का दावा किया गया है।

कीमतों में बाद में कुछ नरमी आने के बावजूद, रिपोर्ट के मुताबिक बाजार पर दबाव बना हुआ है। अमेरिका में खुदरा डीजल की कीमतों में भी भारी बढ़ोतरी की बात कही गई है।

हालांकि, इन कीमतों और प्रतिशत में बदलाव की सही अवधि तथा तुलना के आधार को समझना जरूरी है। अंतरराष्ट्रीय थोक कीमतें और आम उपभोक्ताओं द्वारा चुकाई जाने वाली खुदरा कीमतें अलग-अलग होती हैं।

आखिर क्यों बढ़ रहा है डीजल संकट का खतरा?

वैश्विक डीजल बाजार पर दबाव बढ़ने के पीछे पश्चिम एशिया में जारी तनाव और तेल की सप्लाई से जुड़े जोखिम प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं।

1. पश्चिम एशिया में संघर्ष का असर

मध्य पूर्व दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल उत्पादक और निर्यातक क्षेत्रों में शामिल है। यहां संघर्ष बढ़ने से कच्चे तेल और तैयार पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।

तेल टर्मिनलों, रिफाइनरियों और परिवहन नेटवर्क को नुकसान पहुंचने या उनके संचालन में बाधा आने से अंतरराष्ट्रीय बाजार तक ईंधन पहुंचने में देरी हो सकती है। इससे उपलब्ध सप्लाई घटती है और कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है।

2. होर्मुज जलडमरूमध्य पर दबाव

होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिए बेहद अहम समुद्री मार्ग है। इसके जरिए बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचते हैं।

यदि इस रास्ते से जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो तेल और ईंधन की सप्लाई में देरी हो सकती है। इसके अलावा, जहाजों के बीमा, परिवहन और सुरक्षा की लागत बढ़ने से भी ईंधन महंगा हो सकता है।

3. रिफाइनरियों की सप्लाई में बाधा

कच्चे तेल को रिफाइन करके डीजल, पेट्रोल और अन्य उत्पाद तैयार किए जाते हैं। यदि रिफाइनरियों का उत्पादन घटता है या उनकी सप्लाई चेन बाधित होती है, तो बाजार में तैयार डीजल की उपलब्धता कम हो सकती है।

ऐसी स्थिति में कच्चा तेल उपलब्ध होने के बावजूद डीजल की मांग पूरी करना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि कच्चे तेल को तैयार ईंधन में बदलने और उसे बाजार तक पहुंचाने में समय लगता है।

4. सरकारी तेल भंडार पर बढ़ता दबाव

ईंधन की कीमतों को नियंत्रित करने और सप्लाई की कमी से निपटने के लिए कुछ देश अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे बाजार को अस्थायी राहत मिलती है, लेकिन रिजर्व सीमित होते हैं।

यदि संकट लंबे समय तक बना रहता है, तो भंडार से लगातार तेल निकालने की क्षमता भी सीमित हो सकती है। ऐसे में बाजार को सामान्य सप्लाई पर लौटने के लिए उत्पादन और निर्यात में वास्तविक सुधार की जरूरत होगी।

डीजल महंगा हुआ तो आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?

डीजल की कीमतें बढ़ने का प्रभाव अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में दिखाई दे सकता है।

  • माल ढुलाई महंगी हो सकती है: ट्रकों और दूसरे मालवाहक वाहनों का ईंधन खर्च बढ़ने से परिवहन कंपनियों की लागत बढ़ सकती है।

  • खाने-पीने की चीजों पर असर: कृषि, भंडारण और परिवहन की लागत बढ़ने पर कुछ वस्तुओं की कीमतों पर दबाव आ सकता है।

  • उद्योगों की लागत बढ़ सकती है: डीजल जनरेटर और डीजल आधारित मशीनों पर निर्भर कारोबार प्रभावित हो सकते हैं।

  • महंगाई का दबाव बढ़ सकता है: यदि ईंधन महंगा रहने से वस्तुओं और सेवाओं की लागत बढ़ती है, तो इसका असर उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है।

  • किसानों का खर्च बढ़ सकता है: डीजल से चलने वाले ट्रैक्टर, पंप और अन्य उपकरणों के इस्तेमाल की लागत बढ़ सकती है।

हालांकि, इन प्रभावों की तीव्रता इस बात पर निर्भर करेगी कि कीमतों में कितनी बढ़ोतरी होती है, संकट कितने समय तक चलता है और संबंधित देश घरेलू बाजार को राहत देने के लिए क्या कदम उठाते हैं।

क्या भारत में भी डीजल महंगा हो सकता है?

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और रिफाइंड ईंधन की कीमतों में लंबे समय तक तेजी रहने से देश की अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ सकता है।

यदि वैश्विक स्तर पर डीजल की सप्लाई कम होती है और आयात की लागत बढ़ती है, तो भारतीय तेल कंपनियों के खर्च पर भी असर पड़ सकता है। इसके बावजूद भारत में डीजल की खुदरा कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार के उतार-चढ़ाव के साथ तुरंत और समान अनुपात में बदलें, यह जरूरी नहीं है। घरेलू कीमतों पर कर, सरकारी नीतियों, तेल कंपनियों के फैसलों और अन्य कारकों का भी असर पड़ता है।

इसलिए वैश्विक डीजल संकट की खबर का मतलब यह नहीं है कि भारत में तुरंत डीजल की किल्लत हो जाएगी या पेट्रोल पंपों पर ईंधन मिलना बंद हो जाएगा। इसके लिए भारत की घरेलू सप्लाई, आयात और उपलब्ध भंडार की स्थिति देखना जरूरी है।

2027 तक संकट बना रहने की आशंका कितनी गंभीर है?

डीजल बाजार की स्थिति काफी हद तक पश्चिम एशिया में तनाव, होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही, रिफाइनरियों के उत्पादन और प्रमुख निर्यातक देशों की सप्लाई पर निर्भर करेगी।यदि निर्यात में सुधार आता है, रिफाइनरियां उत्पादन बढ़ाती हैं और समुद्री परिवहन सामान्य होता है, तो बाजार पर दबाव कम हो सकता है। इसके उलट, यदि सप्लाई में रुकावट जारी रहती है और भंडार लगातार घटते हैं, तो कीमतों में तेजी और क्षेत्रीय स्तर पर ईंधन की कमी का जोखिम बना रह सकता है।