महंगाई ने फिर बढ़ाई चिंता: जून में रिटेल इंफ्लेशन 4.38% पर पहुंचा, वीडियो में जाने आलू-अदरक समेत खाद्य पदार्थ हुए महंगे
आम आदमी की रसोई पर महंगाई का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। आलू, अदरक और अन्य खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेजी के चलते देश की रिटेल महंगाई (CPI) लगातार छठे महीने बढ़ी है। जून में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.38% पर पहुंच गई, जो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 4% के मध्य लक्ष्य (Midpoint Target) से ऊपर है। इससे ब्याज दरों और आर्थिक वृद्धि को लेकर नई चिंताएं पैदा हो गई हैं।
सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, मई में रिटेल महंगाई 4.02% (या उपयोगकर्ता द्वारा दिए गए संदर्भ के अनुसार 4.38% से पहले का स्तर) के मुकाबले जून में बढ़कर 4.38% दर्ज की गई। जनवरी से अब तक महंगाई में लगातार वृद्धि का सिलसिला जारी है। जनवरी में यह केवल 2.74% थी।
खाद्य महंगाई में सबसे ज्यादा उछाल
महंगाई बढ़ने की सबसे बड़ी वजह खाद्य पदार्थों की कीमतों में तेजी रही। जून में फूड इन्फ्लेशन बढ़कर 5.32% पर पहुंच गई, जबकि मई में यह 4.38% थी।विशेष रूप से आलू, अदरक और अन्य आवश्यक खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी ने घरेलू बजट पर अतिरिक्त बोझ डाला है। विशेषज्ञों का कहना है कि खाद्य वस्तुओं की महंगाई का सीधा असर आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ता है।
RBI के लक्ष्य से ऊपर पहुंची महंगाई
जनवरी 2025 के बाद यह पहला अवसर है जब खुदरा महंगाई RBI के 4% के मध्य लक्ष्य को पार कर गई है। हालांकि, यह अभी भी केंद्रीय बैंक के 2% से 6% के स्वीकार्य दायरे (Tolerance Band) के भीतर बनी हुई है।इसके बावजूद यदि आने वाले महीनों में महंगाई का दबाव इसी तरह बढ़ता रहा, तो RBI को ब्याज दरों में बढ़ोतरी जैसे सख्त कदम उठाने पड़ सकते हैं।
ब्याज दरें बढ़ीं तो क्या होगा असर?
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि महंगाई पर काबू पाने के लिए RBI ब्याज दरें बढ़ाता है, तो इसका असर होम लोन, ऑटो लोन और बिजनेस लोन पर पड़ सकता है। ऋण महंगे होने से निवेश और उपभोक्ता खर्च प्रभावित हो सकते हैं, जिससे देश की आर्थिक विकास दर (GDP Growth) पर भी दबाव बढ़ने की आशंका है।
RBI पहले ही बढ़ा चुका है महंगाई का अनुमान
रिजर्व बैंक ने जून में अपनी मौद्रिक नीति समीक्षा के दौरान वित्त वर्ष के लिए महंगाई का अनुमान 4.6% से बढ़ाकर 5.1% कर दिया था।
केंद्रीय बैंक ने इसके पीछे दो प्रमुख कारण बताए थे—
- अल नीनो की स्थिति के कारण सामान्य से कम मानसून की आशंका।
- ऊर्जा (एनर्जी) कीमतों में बढ़ोतरी, जिससे उत्पादन और परिवहन लागत बढ़ने का जोखिम।
RBI का मानना है कि यदि इन दोनों कारकों का असर लंबे समय तक बना रहता है, तो महंगाई पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
आगे कैसी रहेगी महंगाई?
विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले महीनों में मानसून की स्थिति, कृषि उत्पादन, वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें और अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक हालात महंगाई की दिशा तय करेंगे। यदि खाद्य आपूर्ति में सुधार होता है और ऊर्जा कीमतों पर नियंत्रण रहता है, तो महंगाई में राहत मिल सकती है। वहीं, विपरीत परिस्थितियों में महंगाई और बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।फिलहाल, जून के आंकड़ों ने यह संकेत जरूर दिया है कि महंगाई एक बार फिर भारतीय अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ताओं के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है।