क्या फिर बढ़ने वाले हैं चावल के दाम? धान की खेती घटने से बाजार में मचेगी खलबली, समझें पूरा गणित
इस साल दक्षिण-पश्चिम मॉनसून सीजन में धान की बुआई के आंकड़ों ने चिंता बढ़ा दी है। कृषि मंत्रालय ने 18 सितंबर को खरीफ फसलों की बुआई के ताजा आंकड़े जारी किए हैं। इनमें सबसे बड़ी गिरावट धान के बुआई क्षेत्र में दर्ज की गई है।आंकड़ों के मुताबिक, पिछले साल 18 सितंबर तक देश में 445.92 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान की बुआई हो चुकी थी। वहीं इस साल इसी तारीख तक धान का रकबा घटकर 429.28 लाख हेक्टेयर रह गया है।यानी एक साल में धान की बुआई का क्षेत्रफल 16.64 लाख हेक्टेयर यानी करीब 3.73 फीसदी कम हुआ है।
इन राज्यों में सबसे ज्यादा घटा धान का रकबा
धान की बुआई में सबसे ज्यादा कमी कई बड़े धान उत्पादक राज्यों में देखने को मिली है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार कर्नाटक में करीब 4.28 लाख हेक्टेयर रकबा कम हुआ है।
इसके बाद तेलंगाना में 3.61 लाख हेक्टेयर, आंध्र प्रदेश में 1.91 लाख हेक्टेयर और तमिलनाडु में 1.32 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई।
वहीं उत्तर प्रदेश में 1.84 लाख हेक्टेयर, मध्य प्रदेश में 1.75 लाख हेक्टेयर, झारखंड में 1.38 लाख हेक्टेयर और महाराष्ट्र में 1.15 लाख हेक्टेयर कम क्षेत्र में धान की बुआई हुई।
इन राज्यों में रकबा घटने का असर देश के कुल धान बुआई आंकड़े पर साफ दिखाई दे रहा है।
क्या किसान कम पानी वाली फसलों की तरफ बढ़ रहे हैं?
धान की बुआई में कमी को सीधे उत्पादन में बड़ी गिरावट के तौर पर देखना जल्दबाजी होगी। ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के महासचिव अजय भलोटिया के मुताबिक, खरीफ सीजन में धान महत्वपूर्ण फसल है, लेकिन फिलहाल रकबे में 3.73 फीसदी की कमी को बड़ी चिंता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
उनका कहना है कि देश में पहले से पर्याप्त बफर स्टॉक मौजूद है। साथ ही अगर किसान धान के बजाय दूसरी फसलों की तरफ जा रहे हैं, तो कम पानी की जरूरत वाली फसलों का विकल्प चुनना भी इसकी एक वजह हो सकती है।
यानी धान के रकबे में कमी के पीछे सिर्फ बारिश की स्थिति नहीं, बल्कि किसानों के बदलते फसल पैटर्न की भूमिका भी हो सकती है।
कुल खरीफ बुआई में भी आई कमी
इस साल सिर्फ धान की बुआई का क्षेत्रफल ही कम नहीं हुआ है। कुल खरीफ फसलों के बुआई क्षेत्र में भी पिछले साल के मुकाबले गिरावट दर्ज की गई है।
18 सितंबर 2025 तक देश में 1118.95 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुआई हुई थी। इस साल 18 सितंबर तक यह आंकड़ा घटकर 1103.90 लाख हेक्टेयर रह गया।
इस तरह कुल खरीफ बुआई में 15.05 लाख हेक्टेयर यानी 1.35 फीसदी की कमी आई है।
दालों की बुआई बढ़ी
हालांकि सभी खरीफ फसलों में गिरावट नहीं हुई है। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, इस साल दालों की बुआई के रकबे में 1.71 लाख हेक्टेयर की बढ़ोतरी हुई है।
वहीं तिलहन फसलों का बुआई क्षेत्र लगभग पिछले साल के स्तर के आसपास बना हुआ है। इससे पता चलता है कि कुल खरीफ रकबा घटने के बावजूद किसानों के बीच अलग-अलग फसलों को लेकर बुआई का रुझान एक जैसा नहीं रहा है।
बारिश का कितना पड़ा असर?
धान की फसल के लिए पानी की उपलब्धता काफी महत्वपूर्ण होती है। दक्षिण-पश्चिम मॉनसून खरीफ सीजन की खेती के लिए अहम भूमिका निभाता है। ऐसे में जिन इलाकों में बारिश सामान्य से कम रही, वहां किसानों के फसल चयन और बुआई के फैसले पर इसका असर पड़ सकता है।
हालांकि धान के रकबे में 3.73 फीसदी कमी का सीधा मतलब यह नहीं है कि चावल का उत्पादन या बाजार में इसकी सप्लाई भी उतनी ही कम हो जाएगी। वास्तविक उत्पादन कई दूसरे कारकों पर निर्भर करेगा, जिसमें प्रति हेक्टेयर पैदावार, मौसम की आगे की स्थिति और उपलब्ध सिंचाई जैसी चीजें शामिल हैं।
क्या चावल की सप्लाई पर असर पड़ेगा?
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर धान के रकबे में आई कमी से तत्काल चावल की सप्लाई पर बड़ा असर पड़ने की संभावना को लेकर विशेषज्ञों ने चिंता नहीं जताई है। देश में मौजूद बफर स्टॉक भी इस मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
अब आगे नजर खरीफ सीजन के वास्तविक उत्पादन और सरकारी स्टॉक की स्थिति पर रहेगी। फिलहाल आंकड़ों की तस्वीर साफ है—धान की बुआई 16.64 लाख हेक्टेयर घटी है, कुल खरीफ बुआई में भी 15.05 लाख हेक्टेयर की कमी आई है, जबकि दालों का रकबा बढ़ा है और तिलहन लगभग स्थिर है।
इसलिए इस साल की खेती को सिर्फ कुल बुआई में आई गिरावट से नहीं, बल्कि किसानों के बदलते फसल पैटर्न और पानी की उपलब्धता के नजरिए से भी समझना होगा।
इस साल दक्षिण-पश्चिम मॉनसून सीजन में धान की बुआई के आंकड़ों ने चिंता बढ़ा दी है। कृषि मंत्रालय ने 18 सितंबर को खरीफ फसलों की बुआई के ताजा आंकड़े जारी किए हैं। इनमें सबसे बड़ी गिरावट धान के बुआई क्षेत्र में दर्ज की गई है।
आंकड़ों के मुताबिक, पिछले साल 18 सितंबर तक देश में 445.92 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान की बुआई हो चुकी थी। वहीं इस साल इसी तारीख तक धान का रकबा घटकर 429.28 लाख हेक्टेयर रह गया है।
यानी एक साल में धान की बुआई का क्षेत्रफल 16.64 लाख हेक्टेयर यानी करीब 3.73 फीसदी कम हुआ है।
इन राज्यों में सबसे ज्यादा घटा धान का रकबा
धान की बुआई में सबसे ज्यादा कमी कई बड़े धान उत्पादक राज्यों में देखने को मिली है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार कर्नाटक में करीब 4.28 लाख हेक्टेयर रकबा कम हुआ है।
इसके बाद तेलंगाना में 3.61 लाख हेक्टेयर, आंध्र प्रदेश में 1.91 लाख हेक्टेयर और तमिलनाडु में 1.32 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई।
वहीं उत्तर प्रदेश में 1.84 लाख हेक्टेयर, मध्य प्रदेश में 1.75 लाख हेक्टेयर, झारखंड में 1.38 लाख हेक्टेयर और महाराष्ट्र में 1.15 लाख हेक्टेयर कम क्षेत्र में धान की बुआई हुई।
इन राज्यों में रकबा घटने का असर देश के कुल धान बुआई आंकड़े पर साफ दिखाई दे रहा है।
क्या किसान कम पानी वाली फसलों की तरफ बढ़ रहे हैं?
धान की बुआई में कमी को सीधे उत्पादन में बड़ी गिरावट के तौर पर देखना जल्दबाजी होगी। ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के महासचिव अजय भलोटिया के मुताबिक, खरीफ सीजन में धान महत्वपूर्ण फसल है, लेकिन फिलहाल रकबे में 3.73 फीसदी की कमी को बड़ी चिंता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
उनका कहना है कि देश में पहले से पर्याप्त बफर स्टॉक मौजूद है। साथ ही अगर किसान धान के बजाय दूसरी फसलों की तरफ जा रहे हैं, तो कम पानी की जरूरत वाली फसलों का विकल्प चुनना भी इसकी एक वजह हो सकती है।
यानी धान के रकबे में कमी के पीछे सिर्फ बारिश की स्थिति नहीं, बल्कि किसानों के बदलते फसल पैटर्न की भूमिका भी हो सकती है।
कुल खरीफ बुआई में भी आई कमी
इस साल सिर्फ धान की बुआई का क्षेत्रफल ही कम नहीं हुआ है। कुल खरीफ फसलों के बुआई क्षेत्र में भी पिछले साल के मुकाबले गिरावट दर्ज की गई है।
18 सितंबर 2025 तक देश में 1118.95 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुआई हुई थी। इस साल 18 सितंबर तक यह आंकड़ा घटकर 1103.90 लाख हेक्टेयर रह गया।
इस तरह कुल खरीफ बुआई में 15.05 लाख हेक्टेयर यानी 1.35 फीसदी की कमी आई है।
दालों की बुआई बढ़ी
हालांकि सभी खरीफ फसलों में गिरावट नहीं हुई है। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, इस साल दालों की बुआई के रकबे में 1.71 लाख हेक्टेयर की बढ़ोतरी हुई है।
वहीं तिलहन फसलों का बुआई क्षेत्र लगभग पिछले साल के स्तर के आसपास बना हुआ है। इससे पता चलता है कि कुल खरीफ रकबा घटने के बावजूद किसानों के बीच अलग-अलग फसलों को लेकर बुआई का रुझान एक जैसा नहीं रहा है।
बारिश का कितना पड़ा असर?
धान की फसल के लिए पानी की उपलब्धता काफी महत्वपूर्ण होती है। दक्षिण-पश्चिम मॉनसून खरीफ सीजन की खेती के लिए अहम भूमिका निभाता है। ऐसे में जिन इलाकों में बारिश सामान्य से कम रही, वहां किसानों के फसल चयन और बुआई के फैसले पर इसका असर पड़ सकता है।
हालांकि धान के रकबे में 3.73 फीसदी कमी का सीधा मतलब यह नहीं है कि चावल का उत्पादन या बाजार में इसकी सप्लाई भी उतनी ही कम हो जाएगी। वास्तविक उत्पादन कई दूसरे कारकों पर निर्भर करेगा, जिसमें प्रति हेक्टेयर पैदावार, मौसम की आगे की स्थिति और उपलब्ध सिंचाई जैसी चीजें शामिल हैं।
क्या चावल की सप्लाई पर असर पड़ेगा?
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर धान के रकबे में आई कमी से तत्काल चावल की सप्लाई पर बड़ा असर पड़ने की संभावना को लेकर विशेषज्ञों ने चिंता नहीं जताई है। देश में मौजूद बफर स्टॉक भी इस मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
अब आगे नजर खरीफ सीजन के वास्तविक उत्पादन और सरकारी स्टॉक की स्थिति पर रहेगी। फिलहाल आंकड़ों की तस्वीर साफ है—धान की बुआई 16.64 लाख हेक्टेयर घटी है, कुल खरीफ बुआई में भी 15.05 लाख हेक्टेयर की कमी आई है, जबकि दालों का रकबा बढ़ा है और तिलहन लगभग स्थिर है।
इसलिए इस साल की खेती को सिर्फ कुल बुआई में आई गिरावट से नहीं, बल्कि किसानों के बदलते फसल पैटर्न और पानी की उपलब्धता के नजरिए से भी समझना होगा।