अहोई अष्टमी पर राधाकुंड में आधी रात को क्यों लगाते हैं आस्था की डुबकी, क्या है इस परंपरा का महत्व
अहोई अष्टमी का पर्व संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए मनाया जाता है। इस दिन माताएं अहोई माता की पूजा करती हैं और संतान के उज्ज्वल भविष्य के लिए व्रत रखती हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के गोवर्धन स्थित राधाकुंड में इस पर्व की एक अनोखी परंपरा देखने को मिलती है। यहां अहोई अष्टमी की आधी रात को हजारों श्रद्धालु पवित्र कुंड में स्नान करने पहुंचते हैं। खास बात यह है कि इस दौरान बड़ी संख्या में निसंतान पति-पत्नी भी संतान सुख की कामना लेकर राधाकुंड पहुंचते हैं।
धार्मिक मान्यता है कि अहोई अष्टमी की मध्यरात्रि में पति-पत्नी एक साथ राधाकुंड में स्नान करते हैं तो राधारानी उन्हें संतान सुख का आशीर्वाद देती हैं। इसी आस्था के चलते हर साल देश के अलग-अलग हिस्सों से दंपती यहां पहुंचते हैं। आइए जानते हैं राधाकुंड में आधी रात को स्नान करने की परंपरा, इससे जुड़ी पौराणिक कथा और धार्मिक महत्व।
अहोई अष्टमी पर आधी रात को क्यों होता है राधाकुंड में स्नान?
मथुरा के गोवर्धन में स्थित राधाकुंड को ब्रज के सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों में गिना जाता है। यहां अहोई अष्टमी यानी कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी की रात मध्यरात्रि में विशेष स्नान की परंपरा है।
मान्यता है कि इस दिन राधाकुंड में श्रद्धापूर्वक स्नान करने से निसंतान दंपतियों को संतान प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है। इसी विश्वास के साथ पति-पत्नी एक-दूसरे का हाथ पकड़कर कुंड में डुबकी लगाते हैं। स्नान के दौरान वे राधा-कृष्ण का स्मरण करते हुए संतान सुख और परिवार की खुशहाली की प्रार्थना करते हैं।
यह परंपरा केवल संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपतियों तक सीमित नहीं है। जिन परिवारों की मनोकामना पूरी हो चुकी होती है, वे भी राधारानी के प्रति आभार जताने के लिए यहां पहुंचते हैं।
क्या है राधाकुंड और श्यामकुंड बनने की पौराणिक कथा?
राधाकुंड की उत्पत्ति को लेकर भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी से जुड़ी एक पौराणिक कथा प्रचलित है। मान्यता के अनुसार, द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने अरिष्टासुर नामक असुर का वध किया था। उसने बैल का रूप धारण कर रखा था।
कथा के अनुसार, अरिष्टासुर के वध के बाद राधारानी और गोपियों ने श्रीकृष्ण से कहा कि उन्होंने गौवंश से जुड़े जीव का वध किया है, इसलिए उन्हें पाप से मुक्ति के लिए तीर्थ स्नान करना चाहिए।
इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी एड़ी से धरती पर प्रहार किया, जिससे वहां एक कुंड बन गया। मान्यता है कि सभी पवित्र तीर्थों का जल इस कुंड में आकर मिल गया। इसे श्यामकुंड कहा गया।
इसके बाद राधारानी ने अपनी सखियों के साथ अपने कंगनों से पास में ही एक दूसरा कुंड खोदा। इसमें भी पवित्र तीर्थों का जल भरा गया। इस कुंड को राधाकुंड के नाम से जाना गया। तभी से राधाकुंड और श्यामकुंड ब्रज के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल हैं।
पति-पत्नी एक साथ लगाते हैं डुबकी
अहोई अष्टमी की मध्यरात्रि में राधाकुंड स्नान की सबसे खास परंपरा पति-पत्नी के एक साथ डुबकी लगाने की है। संतान सुख की कामना करने वाले दंपती हाथ पकड़कर कुंड में उतरते हैं और राधारानी से अपनी मनोकामना पूरी करने की प्रार्थना करते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दौरान पेठे का फल अर्पित करने की भी परंपरा है। कुछ श्रद्धालु लाल कपड़े में लिपटा पेठा कुंड में प्रवाहित करते हैं। जिन दंपतियों को संतान सुख प्राप्त हो जाता है, वे बाद में अपने बच्चे के साथ यहां आकर राधारानी के प्रति आभार व्यक्त करते हैं।
1 नवंबर 2026 को लगेगा राधाकुंड में विशेष मेला
इस साल 1 नवंबर 2026, रविवार को अहोई अष्टमी के अवसर पर राधाकुंड में विशेष मेला आयोजित किया जा रहा है। इस दौरान देशभर से श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है। मध्यरात्रि में होने वाले मुख्य स्नान को लेकर विशेष तैयारियां की गई हैं।
ABP Live की रिपोर्ट के अनुसार, इस बार मध्यरात्रि स्नान का प्रमुख समय रात 11 बजकर 37 मिनट से देर रात 12 बजकर 29 मिनट तक बताया गया है। श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए कुंड में बैरिकेडिंग, गोताखोर, मोटर बोट, सीसीटीवी कैमरे और ड्रोन से निगरानी की व्यवस्था की गई है।
राधाकुंड स्नान का धार्मिक महत्व
अहोई अष्टमी पर राधाकुंड में स्नान को राधारानी और भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अटूट आस्था का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से प्रार्थना करने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। विशेष रूप से संतान सुख की इच्छा रखने वाले दंपतियों के लिए इस दिन का धार्मिक महत्व बहुत अधिक है।