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वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी 2026: जब देवताओं को सताने लगा असुर, तब गणेश जी ने लिया ये रूप
 

 

हिंदू धर्म में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उनकी पूजा करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाता है। कार्तिक मास में पड़ने वाली इस चतुर्थी को वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। साल 2026 में यह व्रत 29 अक्टूबर, गुरुवार को रखा जाएगा। इस दिन भगवान गणेश के वक्रतुंड स्वरूप की पूजा करने की परंपरा है।

धार्मिक कथाओं के अनुसार, भगवान गणेश ने वक्रतुंड रूप धारण करके एक शक्तिशाली असुर के आतंक से देवताओं को मुक्ति दिलाई थी। आइए जानते हैं इस अवतार से जुड़ी पौराणिक कथा और व्रत का महत्व।

मत्सरासुर ने देवताओं को क्यों किया परेशान?

पौराणिक कथा के अनुसार, मत्सरासुर भगवान शिव का परम भक्त था। उसने कठोर तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न किया और उनसे अभय होने का वरदान प्राप्त किया। यह वरदान मिलने के बाद उसका साहस बढ़ गया। धीरे-धीरे वह अपनी शक्ति का गलत इस्तेमाल करने लगा और देवताओं को परेशान करने लगा।

मत्सरासुर के अत्याचार बढ़ने लगे तो देवता चिंतित हो गए। उसने स्वर्ग पर अधिकार जमाने की कोशिश की और देवताओं के सामने संकट खड़ा कर दिया। असुर के आतंक से परेशान होकर देवताओं ने भगवान गणेश की शरण ली। उन्होंने विघ्नहर्ता से मत्सरासुर के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की।

देवताओं की रक्षा के लिए गणेश जी ने लिया वक्रतुंड अवतार

देवताओं की पुकार सुनकर भगवान गणेश ने वक्रतुंड स्वरूप धारण किया। वक्रतुंड का अर्थ मुड़ी हुई सूंड वाले भगवान गणेश से है। धार्मिक मान्यताओं में इस अवतार का वाहन सिंह बताया गया है।

इसके बाद भगवान गणेश ने मत्सरासुर को युद्ध के लिए चुनौती दी। दोनों के बीच भीषण युद्ध हुआ। कथा के अनुसार, भगवान गणेश ने मत्सरासुर के पुत्रों का संहार किया और अंत में असुर को पराजित कर दिया। गणेश जी की शक्ति के सामने मत्सरासुर का अहंकार टिक नहीं सका।

हार के बाद मत्सरासुर ने मांगी क्षमा

पौराणिक कथा के अनुसार, युद्ध में पराजित होने के बाद मत्सरासुर को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने भगवान गणेश से क्षमा मांगी और उनके सामने समर्पण कर दिया। इसके बाद वह गणेश जी का भक्त बन गया।इस कथा को अहंकार, ईर्ष्या और गलत आचरण पर विजय का प्रतीक माना जाता है। भगवान गणेश का वक्रतुंड स्वरूप यह संदेश देता है कि शक्ति का इस्तेमाल दूसरों को परेशान करने के लिए नहीं, बल्कि संकट दूर करने और धर्म की रक्षा के लिए होना चाहिए।

वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी का क्या है महत्व?

धार्मिक मान्यताओं में संकष्टी का अर्थ संकटों से मुक्ति से जोड़ा जाता है। इस दिन श्रद्धालु भगवान गणेश के लिए व्रत रखते हैं और परिवार की सुख-शांति तथा जीवन की बाधाएं दूर होने की कामना करते हैं।

व्रत रखने वाले भक्त सुबह स्नान के बाद संकल्प लेते हैं। इसके बाद भगवान गणेश को दूर्वा, फूल, धूप-दीप और मोदक या लड्डुओं का भोग अर्पित किया जाता है। शाम को व्रत कथा पढ़ी या सुनी जाती है। रात में चंद्रमा के दर्शन करके अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलने की परंपरा है। पूजा-विधि स्थानीय और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार अलग हो सकती है।

वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी 2026 की तारीख

पंचांग के अनुसार, वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी का व्रत 29 अक्टूबर 2026, गुरुवार को रखा जाएगा। चतुर्थी तिथि 29 अक्टूबर को सुबह 1 बजकर 6 मिनट से शुरू होकर रात 10 बजकर 9 मिनट तक रहने की जानकारी दी गई है। चंद्रमा निकलने का समय शहर के अनुसार अलग हो सकता है, इसलिए व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार चंद्रोदय का समय देखना चाहिए।