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Tulja Bhawani Temple: नवरात्रि से पहले 8 दिन चांदी के पलंग पर विराजती हैं मां भवानी, दशहरे पर 108 साड़ियों में निकलती है पालकी

 

महाराष्ट्र के तुलजापुर स्थित मां तुलजा भवानी मंदिर की परंपराएं नवरात्रि को खास बनाती हैं। यहां देवी की मूल प्रतिमा को साल में तीन बार सिंहासन से उतारकर चांदी के पलंग पर शयन कराया जाता है। नवरात्रि से पहले आठ दिन तक चलने वाली इस परंपरा को ‘मंचकी निद्रा’ कहा जाता है। वहीं, दशहरे पर देवी की मूल प्रतिमा को 108 सूती साड़ियों में लपेटकर पालकी में रखा जाता है और सीमोल्लंघन की रस्म निभाई जाती है।

छत्रपति शिवाजी महाराज की कुलदेवी के रूप में पूजित मां भवानी को पराक्रम, साहस और रक्षा की शक्ति का प्रतीक माना जाता है। मंदिर में नवरात्रि के दौरान विशेष पूजा-अर्चना होती है और तीन कलश स्थापित किए जाते हैं।

करीब तीन फीट ऊंची है मां भवानी की प्रतिमा

मंदिर के गर्भगृह में काले पत्थर से बनी करीब तीन फीट ऊंची मां भवानी की प्रतिमा स्थापित है। देवी महिषासुरमर्दिनी स्वरूप में दिखाई देती हैं। उनके आठ हाथों में त्रिशूल, खंजर, बाण, चक्र, शंख, धनुष और पात्र सहित विभिन्न आयुध दर्शाए गए हैं। एक हाथ से देवी ने महिषासुर के बाल पकड़ रखे हैं।

प्रतिमा में देवी का दायां पैर महिषासुर को दबाए हुए है, जबकि बाईं ओर सिंह की आकृति बनी है। प्रतिमा के पास सूर्य और चंद्रमा के प्रतीक भी हैं। देवी के मुकुट पर शिवलिंग की आकृति दिखाई देती है। इस प्रतिमा की खासियत यह है कि इसे सिंहासन से हटाया जा सकता है। इसी कारण इसे चल प्रतिमा कहा जाता है।

साल में 21 दिन शयन करती हैं मां भवानी

तुलजापुर मंदिर में देवी को साल में तीन बार सिंहासन से उतारकर पलंग पर शयन कराने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसे देवी के विश्राम और शक्ति संचय से जोड़ा जाता है।

  • शारदीय नवरात्रि से पहले: आठ दिन
  • दशहरे के बाद: पांच दिन
  • शाकंभरी नवरात्रि से पहले: आठ दिन

इस तरह देवी कुल 21 दिन शयन करती हैं। शयन की रस्म के दौरान अभिषेक और आरती के बाद पुजारी मूल प्रतिमा को सिंहासन से उठाकर गर्भगृह के पास बने शयन कक्ष में चांदी के पलंग पर रखते हैं।

नवरात्रि में स्थापित होते हैं तीन कलश

तुलजा भवानी मंदिर में घटस्थापना के लिए तीन मिट्टी के कलश लाए जाते हैं। इन्हें धाकटे तुलजापुर का पारंपरिक कुम्हार परिवार उपलब्ध कराता है। कलशों में गोमुख और कल्लोल तीर्थ का जल भरा जाता है।

मंदिर की परंपरा के अनुसार, कलश अलग-अलग निर्धारित स्थानों पर स्थापित किए जाते हैं। इसके बाद दुर्गा सप्तशती का पाठ और विशेष पूजा शुरू होती है। महानवमी पर हवन के साथ कलश पूजा का समापन होता है।

दशहरे पर 108 साड़ियों में लपेटी जाती है मूल प्रतिमा

तुलजापुर में दशहरे की प्रमुख परंपराओं में देवी की सीमोल्लंघन यात्रा शामिल है। इस रस्म में मां भवानी की मूल प्रतिमा को गर्भगृह से बाहर लाया जाता है। यात्रा से पहले प्रतिमा का अभिषेक किया जाता है और उसे 108 सफेद सूती साड़ियों में लपेटा जाता है।

साड़ियों की कई तह प्रतिमा को उठाने और पालकी में रखने के दौरान सुरक्षित रखने में मदद करती हैं। इसके बाद देवी को विशेष पालकी में विराजमान कर मंदिर परिसर में यात्रा कराई जाती है। इस दौरान पुजारी, महंत और मंदिर के सेवक शामिल होते हैं। श्रद्धालु कुंकुम और फूल अर्पित करते हैं।

मंदिर परिसर में पीपल के पेड़ के पास पालकी रोककर आरती की जाती है। सीमोल्लंघन की रस्म पूरी होने के बाद देवी को फिर शयन कराया जाता है। इस शयन को ‘श्रमनिद्रा’ कहा जाता है।

पांच दिनों तक देवी के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा

नवरात्रि के दौरान तुलजा भवानी मंदिर में देवी के विभिन्न स्वरूपों की विशेष पूजा होती है। इनमें देवी के पारंपरिक आयुधों वाले स्वरूप के साथ भगवान श्रीकृष्ण की बांसुरी और मां भवानी की तलवार से जुड़ा विशेष रूप भी शामिल बताया जाता है। इन धार्मिक अनुष्ठानों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं।

सुबह 4:30 बजे से रात 9:30 बजे तक पूजा-अर्चना

मंदिर में दिनभर अलग-अलग चरणों में पूजा और आरती की परंपरा है।

  • सुबह 4:30 बजे: चरणतीर्थ और काकड़ आरती से दिन की शुरुआत होती है।
  • सुबह 6 बजे: पंचामृत अभिषेक किया जाता है। इसके बाद गोमुख तीर्थ के जल से प्रतिमा का स्नान कराया जाता है।
  • सुबह 6 से 10 बजे तक: भक्त अभिषेक पूजा करते हैं। इस दौरान विशेष सिंहासन महापूजाएं भी आयोजित होती हैं।
  • सुबह 11 बजे: देवी का वस्त्रालंकार और श्रृंगार किया जाता है। इसके बाद आरती और धूपारती होती है।
  • शाम 7 से रात 9 बजे तक: अभिषेक पूजा और विशेष महापूजाएं होती हैं।
  • रात 9:30 बजे: वस्त्रालंकार, आरती और धूपारती के बाद प्रक्षाल पूजा की जाती है। इस दौरान गर्भगृह और सिंहासन की सफाई होती है।

मां तुलजा भवानी मंदिर की ये परंपराएं धार्मिक आस्था, प्राचीन रीति-रिवाजों और ऐतिहासिक विरासत का अनूठा संगम मानी जाती हैं। नवरात्रि और दशहरे के दौरान यहां होने वाले अनुष्ठान मंदिर की विशिष्ट पहचान हैं।