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आज संंतान सप्तमी पर लोलार्क कुंड में स्नान करेंगे निसंतान दंपत्ति, कहां से इस कुंड में आता है पानी?

 

वाराणसी के भदैनी स्थित ऐतिहासिक लोलार्क कुंड में संतान की कामना लेकर बड़ी संख्या में दंपत्ति स्नान कर रहे हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार लोलार्क कुंड में स्नान करने से निसंतान दंपत्तियों को संतान सुख की प्राप्ति होती है। हर साल भाद्रपद शुक्ल पक्ष की षष्ठी के आसपास यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है। इस बार भी दूर-दराज के इलाकों से दंपत्ति वाराणसी पहुंचे हैं।

लोलार्क कुंड में स्नान की क्या है मान्यता

लोलार्क कुंड काशी के प्राचीन धार्मिक स्थलों में शामिल है। काशी के आधिकारिक पोर्टल के अनुसार यह कुंड सूर्य देव के लोलार्क स्वरूप से जुड़ा हुआ है और यहां स्नान तथा पूजा को संतान प्राप्ति और धार्मिक आस्था से जोड़ा जाता है। कुंड का वर्तमान स्वरूप ऐतिहासिक रूप से रानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा कराए गए निर्माण और सुधार कार्यों से भी जुड़ा है।

मान्यता है कि संतान की इच्छा रखने वाले दंपत्ति यहां विशेष अवसर पर एक साथ स्नान करते हैं और लोलार्केश्वर महादेव तथा सूर्यदेव की पूजा करते हैं। स्नान के बाद किसी एक फल या सब्जी का त्याग करने की परंपरा भी बताई जाती है। यह धार्मिक मान्यता है, इसका कोई चिकित्सकीय प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।

सबसे बड़ा सवाल, कुंड में पानी आता कहां से है?

लोलार्क कुंड को लेकर सबसे रहस्यमयी बात इसका जलस्रोत है। उपलब्ध स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार आज तक इसके पानी के वास्तविक स्रोत का स्पष्ट पता नहीं चल पाया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कुंड का पानी सीधे गंगा या केवल बारिश के पानी से नहीं आता। इसी वजह से स्थानीय धार्मिक परंपरा में इसे ‘पाताल लोक’ से जुड़ा हुआ भी माना जाता है।

यानी लोलार्क कुंड के पानी को लेकर धार्मिक मान्यताएं काफी प्रचलित हैं, लेकिन इसके वास्तविक भूजल स्रोत की वैज्ञानिक रूप से स्पष्ट पहचान सामने नहीं आई है। यही रहस्य इस प्राचीन कुंड को लेकर लोगों की जिज्ञासा को और बढ़ाता है।

सूर्य की किरणों से भी है खास संबंध

लोलार्क कुंड की बनावट भी इसे खास बनाती है। धार्मिक परंपरा और स्थानीय मान्यता के अनुसार भाद्रपद शुक्ल षष्ठी के दिन सूर्य की किरणें विशेष तरीके से कुंड के जल पर पड़ती हैं। इसी कारण इसका संबंध सूर्य उपासना से जोड़ा जाता है। ‘लोलार्क’ शब्द का अर्थ भी ‘चंचल या कंपायमान सूर्य’ बताया जाता है।

पौराणिक मान्यता में यह भी कहा जाता है कि कभी सूर्यदेव के रथ का पहिया यहां गिरा था, जिसके बाद इस स्थान का संबंध सूर्य उपासना से जुड़ गया। हालांकि ये धार्मिक और पौराणिक मान्यताएं हैं, ऐतिहासिक या वैज्ञानिक तथ्य के रूप में इन्हें अलग-अलग देखा जाना चाहिए।

क्यों उमड़ती है इतनी भीड़?

लोलार्क कुंड में संतान की कामना से स्नान करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इसी आस्था के चलते उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों से दंपत्ति यहां पहुंचते हैं। 2026 में भी प्रशासन ने श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन के इंतजाम किए हैं।

इस तरह लोलार्क कुंड सिर्फ एक प्राचीन जल संरचना नहीं, बल्कि काशी की धार्मिक परंपरा, सूर्य उपासना और लोक आस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण तीर्थ है। इसके जलस्रोत का रहस्य आज भी लोगों के लिए कौतूहल का विषय बना हुआ है।