कलियुग के श्रवण कुमार! खुशीराम पाल ने माता-पिता को पालकी में बैठाकर 15 किमी पैदल तय किया सफर, झूमरनाथ धाम में लिया आशीर्वाद
माता-पिता की सेवा को भारतीय संस्कृति में सबसे बड़ा धर्म माना गया है। इसी भावना को साकार करते हुए एक युवक ने ऐसा उदाहरण पेश किया है कि लोग उसे 'कलियुग का श्रवण कुमार' कहकर सम्मान दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही इस प्रेरणादायक कहानी में खुशीराम पाल ने अपने बुजुर्ग माता-पिता को पालकी में बैठाकर करीब 15 किलोमीटर पैदल यात्रा कर झूमरनाथ धाम पहुंचाया।
15 किलोमीटर तक कंधों पर उठाई पालकी
जानकारी के अनुसार, खुशीराम पाल ने अपने माता-पिता की लंबे समय से चली आ रही धार्मिक इच्छा को पूरा करने का संकल्प लिया। चूंकि उनके माता-पिता लंबी दूरी पैदल चलने में सक्षम नहीं थे, इसलिए उन्होंने उन्हें पालकी में बैठाया और स्वयं उसे कंधों पर उठाकर लगभग 15 किलोमीटर का सफर तय किया।
उनकी इस सेवा और समर्पण को देखकर रास्ते में मौजूद श्रद्धालु भी भावुक हो गए और कई लोगों ने उनकी सराहना की।
झूमरनाथ धाम पहुंचकर लिया आशीर्वाद
लंबी पदयात्रा के बाद खुशीराम पाल अपने माता-पिता को सुरक्षित झूमरनाथ धाम लेकर पहुंचे। वहां परिवार ने भगवान के दर्शन किए और पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि की कामना की। माता-पिता ने भी बेटे के इस समर्पण पर उसे आशीर्वाद दिया।
सोशल मीडिया पर लोग कर रहे तारीफ
इस घटना की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। लोग खुशीराम पाल की तुलना पौराणिक पात्र श्रवण कुमार से कर रहे हैं, जिन्होंने अपने माता-पिता को तीर्थ यात्रा कराने के लिए कंधों पर उठाकर लंबी यात्रा की थी।
एक यूजर ने लिखा, "आज के दौर में भी ऐसे बेटे हैं, यह देखकर भारतीय संस्कारों पर गर्व होता है।" वहीं दूसरे यूजर ने कहा, "माता-पिता की सेवा से बढ़कर कोई पूजा नहीं।"
माता-पिता की सेवा का संदेश
खुशीराम पाल की यह पहल केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि माता-पिता के प्रति सम्मान, प्रेम और सेवा का प्रेरणादायक संदेश भी देती है। उनकी कहानी यह याद दिलाती है कि जीवन में माता-पिता की सेवा और उनका सम्मान सबसे बड़ा कर्तव्य माना गया है।