कार्तिक स्नान और पूजा से ही सत्यभामा और रुक्मिणी को मिले थे कृष्ण
सभी मासों में कार्तिक मास श्रेष्ठ हैं। देवताओं में भगवान विष्णु (मधुसूदन) श्रेष्ठ हैं। तीर्थों में नारायण तीर्थ श्रेष्ठ हैं। ये तीनों (कार्तिक मास, भगवान मधुसूदन की भक्ति और नारायण तीर्थ का संयोग या लाभ) कलियुग में बहुत दुर्लभता से मिलते हैं।’ इस माह की पूर्णिमा को चंद्रमा कृतिका नक्षत्र में होता है, इसलिए इस मास का नाम कार्तिक है।
दीप दान, तुलसी पूजा
इसी मास में देव उठनी एकादशी के दिन विष्णु अपनी योगनिद्रा से जागते हैं। इससे देवशयनी एकादशी से बंद पड़े सभी मांगलिक कार्य फिर से शुरू हो जाते हैं। माना जाता है कि इस मास में विष्णु जल में निवास करते हैं। इस महीने में विष्णु, लक्ष्मी और तुलसी की आराधना की जाती है। कार्तिक मास में दीपदान और सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान का विशेष महत्व है। पद्मपुराण की कथा के अनुसार कार्तिक स्नान और पूजा के पुण्य से ही सत्यभामा और देवी रुक्मिणी को कृष्ण की पत्नी होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। इस मास में देव पूजा के लिए पांच नियमों- ब्रह्म मुहूर्त में स्नान, दीप दान, तुलसी पूजा, भूमि पर शयन और दाल के निषेध के साथ सात्विक भोजन करना उत्तम बताया गया है।
इस मास का नाम दामोदर मास
कार्तिक मास को दामोदर मास भी कहते हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार कृष्ण की शरारतों से तंग आकर यशोदा ने उनके पेट (उदर) को रस्सी (दाम) से एक ऊखल के साथ बांध दिया था। इस कारण कृष्ण का एक नाम दामोदर हो गया। यह लीला कार्तिक मास में हुई थी, इसलिए इस मास का नाम दामोदर मास हो गया।
करवा चौथ और अहोई अष्टमी पर्व भी इसी माह
पति और पुत्र की मंगल कामना के लिए करवा चौथ और अहोई अष्टमी पर्व भी इसी माह मनाए जाते हैं। गोपाष्टमी पर्व के दिन ही गाय की पूजा के साथ ही गोवर्धन की पूजा भी की जाती है। इसी दिन कृष्ण ने अपनी उंगली पर धारण किए गोवर्धन पर्वत को पृथ्वी पर वापिस रखा था। कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही शिव त्रिपुरासुर का वध करके त्रिपुरारी कहलाए। इस विजय पर प्रसन्न होकर देवताओं ने उत्सव मनाया। आगे चलकर इसे देव दीवाली कहा गया।
इसके अलावा इस मास में धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दीवाली, गोवर्धन पूजा, भैया दूज, चित्रगुप्त जयंती, महावीर स्वामी निर्वाण दिवस छठ पूजा, तुलसी विवाह, आंवला नवमी, गुरुनानक जयंती, बंदी छोड़ दिवस, पुष्कर मेला और मास के अंतिम पांच दिन तक मनाया जाने वाला भीष्म पंचक आदि पर्व भी आते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो लोग पूरे कार्तिक माह में नियम-संयम या नदी में स्नान नहीं कर पाते हैं, वे यदि केवल भीष्म पंचक के अंतिम पांच दिनों में इसका पालन कर लें, तो उन्हें पूरे कार्तिक मास का पुण्य फल प्राप्त हो जाता है।