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परिवर्तिनी एकादशी 2026: 22 सितंबर को रखा जाएगा व्रत, 23 को इस समय करें पारण, समय निकल जाए तो ऐसे खोलें व्रत
 

 

हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। साल में आने वाली सभी एकादशियों में परिवर्तिनी एकादशी को भी महत्वपूर्ण माना गया है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी, जलझूलनी एकादशी और डोल ग्यारस के नाम से जाना जाता है। साल 2026 में परिवर्तिनी एकादशी का व्रत 22 सितंबर, मंगलवार को रखा जाएगा। इस दिन भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की पूजा करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार एकादशी का व्रत करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और व्यक्ति को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।

22 सितंबर को रखा जाएगा व्रत

पंचांग के अनुसार भाद्रपद शुक्ल एकादशी तिथि 21 सितंबर की रात में शुरू होगी और 22 सितंबर की रात तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर परिवर्तिनी एकादशी का व्रत 22 सितंबर को रखा जाएगा। इस दिन व्रती सुबह स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें। पूजा में पीले फूल, फल, तुलसी दल और पंचामृत अर्पित करने की परंपरा है। इसके साथ ही भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना भी शुभ माना जाता है।

परिवर्तिनी एकादशी को भगवान विष्णु के करवट बदलने से भी जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में रहते हैं और परिवर्तिनी एकादशी के दिन करवट बदलते हैं। इसी वजह से इस एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है।

23 सितंबर को इस समय करें पारण

एकादशी व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी तिथि में किया जाता है। साल 2026 में परिवर्तिनी एकादशी के व्रत का पारण 23 सितंबर, बुधवार को किया जाएगा। उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार पारण के लिए सुबह का समय निर्धारित रहेगा। व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को सूर्योदय के बाद द्वादशी तिथि और पारण काल देखकर व्रत खोलना चाहिए।

पारण से पहले भगवान विष्णु की पूजा करें और उन्हें तुलसी दल अर्पित करें। इसके बाद जल ग्रहण करके फलाहार या सात्विक भोजन से व्रत खोल सकते हैं। पारण के समय अपनी स्थानीय पंचांग गणना को प्राथमिकता देना उचित माना जाता है, क्योंकि अलग-अलग शहरों में सूर्योदय और तिथि के समय में अंतर हो सकता है।

पारण का समय निकल जाए तो क्या करें?

कई बार किसी कारण से निर्धारित पारण समय में व्रत खोलना संभव नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में बिना घबराए स्थानीय पंचांग या किसी विद्वान से द्वादशी तिथि की स्थिति की जानकारी लेनी चाहिए। यदि द्वादशी तिथि अभी चल रही हो तो उचित समय देखकर पारण किया जा सकता है। पारण करते समय भगवान विष्णु का स्मरण करें और पहले जल ग्रहण करने के बाद फल या सात्विक भोजन लें।

यदि किसी विशेष परिस्थिति के कारण पारण में देरी हो जाए, तो अपनी परंपरा और स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेना चाहिए। लंबे समय तक निर्जल व्रत रखना हर व्यक्ति के लिए उचित नहीं होता। स्वास्थ्य संबंधी परेशानी होने पर व्रत की कठोरता के बजाय स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना जरूरी है।

परिवर्तिनी एकादशी पर करें ये काम

इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने की परंपरा है। भगवान को तुलसी दल अर्पित करना विशेष माना जाता है। जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करने की भी धार्मिक मान्यता है। एकादशी के दिन सात्विक आहार, भगवान का नाम स्मरण और संयमित दिनचर्या रखने की सलाह दी जाती है।

परिवर्तिनी एकादशी का व्रत आस्था और धार्मिक परंपराओं से जुड़ा है। पूजा, व्रत और पारण के नियम अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों की परंपराओं के अनुसार कुछ अलग हो सकते हैं। इसलिए व्रत रखने वाले श्रद्धालु अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार तिथि और पारण का समय अवश्य देख लें।