पितृपक्ष में किस तिथि का श्राद्ध एक ही दिन, पढ़ें श्राद्ध की सही तिथि
पितृ पक्ष को हिंदू धर्म में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष समय माना जाता है। इस दौरान लोग अपने दिवंगत परिजनों की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं। इस बार पितृ पक्ष की तिथियों में एक खास बदलाव देखने को मिल रहा है। चतुर्थी और पंचमी दोनों तिथियों का श्राद्ध एक ही दिन किया जाएगा।
30 सितंबर को होगा चतुर्थी-पंचमी श्राद्ध
2026 में 30 सितंबर, बुधवार को चतुर्थी और पंचमी दोनों तिथियों का श्राद्ध किया जाएगा। पंचांग के अनुसार चतुर्थी तिथि 29 सितंबर की शाम से शुरू होकर 30 सितंबर को दोपहर तक रहेगी। इसके बाद पंचमी तिथि शुरू होगी।
श्राद्ध कर्म के लिए अपराह्न काल को विशेष महत्व दिया जाता है। इसी वजह से दोनों तिथियों का श्राद्ध 30 सितंबर को ही करने का विधान बन रहा है।
पितृ पक्ष की प्रमुख श्राद्ध तिथियां
2026 में पितृ पक्ष की मुख्य श्राद्ध तिथियां इस प्रकार हैं:
27 सितंबर — प्रतिपदा श्राद्ध
28 सितंबर — द्वितीया श्राद्ध
29 सितंबर — तृतीया और महाभरणी श्राद्ध
30 सितंबर — चतुर्थी और पंचमी श्राद्ध
1 अक्टूबर — षष्ठी श्राद्ध
2 अक्टूबर — सप्तमी श्राद्ध
3 अक्टूबर — अष्टमी श्राद्ध
4 अक्टूबर — नवमी श्राद्ध
5 अक्टूबर — दशमी श्राद्ध
6 अक्टूबर — एकादशी श्राद्ध
7 अक्टूबर — द्वादशी और मघा श्राद्ध
8 अक्टूबर — त्रयोदशी श्राद्ध
9 अक्टूबर — चतुर्दशी श्राद्ध
10 अक्टूबर — सर्वपितृ अमावस्या
किस तिथि को करें पितरों का श्राद्ध?
धार्मिक परंपरा के अनुसार, पितृ पक्ष में श्राद्ध उस तिथि पर किया जाता है जिस तिथि को पूर्वज का निधन हुआ था। इसलिए अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख के बजाय हिंदू पंचांग की तिथि देखी जाती है।
यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है, तो सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध करने की परंपरा है। 2026 में सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को होगी।
श्राद्ध में अपराह्न काल का महत्व
श्राद्ध की तारीख निर्धारित करते समय केवल तिथि का होना ही नहीं देखा जाता, बल्कि यह भी देखा जाता है कि संबंधित तिथि अपराह्न काल में मौजूद है या नहीं। इसी गणना के कारण इस साल चतुर्थी और पंचमी का श्राद्ध 30 सितंबर को एक ही दिन पड़ रहा है।
पितृ पक्ष में तर्पण, पिंडदान, श्राद्ध, ब्राह्मण भोजन और जरूरतमंदों को दान करने की परंपरा है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में श्राद्ध की विधि में अंतर हो सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग और पारिवारिक परंपरा के अनुसार समय और विधि का पालन करना उचित माना जाता है।