एक ही पूर्णिमा कहीं राखी, कहीं समुद्र पूजा और कहीं वेदों का उत्सव, 28 अगस्त को भारत के पांच रंग
भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता की सबसे खूबसूरत तस्वीर पर्व और त्योहारों में देखने को मिलती है। एक ही तिथि पर देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग परंपराएं और उत्सव मनाए जाते हैं। 28 अगस्त 2026 को पड़ने वाली श्रावण पूर्णिमा भी इसी विविधता का उदाहरण है। इस दिन जहां देशभर में भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक रक्षाबंधन मनाया जाएगा, वहीं अलग-अलग राज्यों और समुदायों में समुद्र पूजा, वेदों का उत्सव और अन्य धार्मिक परंपराएं भी निभाई जाएंगी।
श्रावण पूर्णिमा का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। सावन का महीना भगवान शिव को समर्पित माना जाता है और पूर्णिमा के साथ इस पवित्र महीने का समापन होता है। इस अवसर पर स्नान, दान, पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठान करने की परंपरा है। खास बात यह है कि पूर्णिमा की यही तिथि भारत के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग सांस्कृतिक रंगों के साथ दिखाई देती है।
उत्तर भारत में रक्षाबंधन की धूम
उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों में श्रावण पूर्णिमा का सबसे प्रमुख पर्व रक्षाबंधन है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं और उनके सुखी एवं दीर्घायु जीवन की कामना करती हैं। भाई भी बहनों की रक्षा का संकल्प लेते हुए उन्हें उपहार देते हैं।
राखी बांधने से पहले बहनें भाई की आरती उतारती हैं, माथे पर तिलक लगाती हैं और मिठाई खिलाती हैं। बाजारों में भी रक्षाबंधन को लेकर विशेष रौनक देखने को मिलती है। रंग-बिरंगी राखियों और मिठाइयों की दुकानों पर भीड़ बढ़ जाती है।
महाराष्ट्र में नारली पूर्णिमा
महाराष्ट्र और पश्चिमी तटीय इलाकों में श्रावण पूर्णिमा को नारली पूर्णिमा के रूप में मनाने की परंपरा है। इस दिन समुद्र और जलदेवता की पूजा की जाती है। मछुआरा समुदाय विशेष रूप से इस पर्व को उत्साह के साथ मनाता है।
नारियल को समुद्र में अर्पित कर सुरक्षित समुद्री यात्रा और अच्छे कारोबार की कामना की जाती है। मानसून के बाद मछली पकड़ने के नए मौसम की शुरुआत से भी इस पर्व का संबंध माना जाता है। समुद्र तटों पर विशेष पूजा और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
केरल में ओणम से जुड़ी परंपराएं
केरल में श्रावण पूर्णिमा के आसपास विभिन्न स्थानीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं देखने को मिलती हैं। राज्य में मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है और कई स्थानों पर पारंपरिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। केरल की पर्व परंपराएं प्रकृति, कृषि और धार्मिक आस्था के साथ गहराई से जुड़ी हुई हैं।
वेदों के सम्मान का पर्व
श्रावण पूर्णिमा का संबंध वैदिक परंपरा से भी है। इसी अवसर पर कई विद्वान और वैदिक परंपरा का पालन करने वाले लोग वेदाध्ययन, मंत्र पाठ और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। इस दिन को संस्कृत और वेदों के अध्ययन से जोड़कर देखा जाता है। कई स्थानों पर वेद पाठ और धार्मिक सभाओं का आयोजन भी होता है।
अलग-अलग परंपराएं, एक ही सांस्कृतिक भावना
श्रावण पूर्णिमा की खासियत यही है कि एक ही तिथि अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है। कहीं भाई-बहन के रिश्ते का उत्सव है, कहीं समुद्र के प्रति कृतज्ञता जताई जाती है तो कहीं ज्ञान और वैदिक परंपरा को सम्मान दिया जाता है।
28 अगस्त को मनाई जाने वाली पूर्णिमा भारत की इसी सांस्कृतिक विविधता को सामने लाएगी। अलग-अलग रीति-रिवाज होने के बावजूद इन सभी पर्वों में आस्था, कृतज्ञता, परिवार, प्रकृति और परंपरा के प्रति सम्मान की भावना समान दिखाई देती है।