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Neem Karoli Baba: ट्रेन की घटना से कैंची धाम तक, जानें कैसे लक्ष्मी नारायण शर्मा बने नीम करोली बाबा
 

 

नीम करोली बाबा का नाम देश के उन संतों में लिया जाता है, जिनकी लोकप्रियता भारत की सीमाओं से बाहर तक पहुंची। उत्तराखंड का कैंची धाम आज उनकी आस्था और आध्यात्मिक विरासत का प्रमुख केंद्र है। हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। बाबा का जीवन भक्ति, सेवा, सादगी और कई रहस्यमयी घटनाओं से जुड़ा रहा है।
11 सितंबर को उनकी पुण्यतिथि के मौके पर उनके जीवन की कहानी एक बार फिर चर्चा में है। आइए जानते हैं कि फिरोजाबाद के लक्ष्मी नारायण शर्मा से लेकर नीम करोली बाबा तक का उनका सफर कैसा रहा और कैंची धाम उनके जीवन का अहम हिस्सा कैसे बना।
फिरोजाबाद में हुआ था जन्म


नीम करोली बाबा का वास्तविक नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा बताया जाता है। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के अकबरपुर गांव में करीब 1900 के आसपास हुआ माना जाता है। उनका संबंध एक संपन्न और प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार से था। उनके माता-पिता का नाम कौशल्या देवी और दुर्गा प्रसाद शर्मा बताया जाता है।
बचपन से ही उनका झुकाव धार्मिक गतिविधियों और पूजा-पाठ की ओर था। खास तौर पर हनुमान जी के प्रति उनकी गहरी आस्था बताई जाती है। कम उम्र में ही उनका विवाह राम बेटी देवी से कर दिया गया था, लेकिन उनका मन लगातार आध्यात्मिक जीवन की ओर खिंचता रहा।


किशोर उम्र में शुरू हुआ साधना का सफर
प्रचलित मान्यताओं के अनुसार, लगभग 17 वर्ष की उम्र में उन्हें आध्यात्मिक अनुभव हुआ। इसके बाद उन्होंने सांसारिक जीवन से दूरी बनानी शुरू कर दी और कई जगहों की यात्रा करते हुए साधना की।
गुजरात के बवानिया मोरबी इलाके में भी उन्होंने समय बिताया, जहां उन्हें तलइया बाबा के नाम से जाना गया। अलग-अलग स्थानों पर रहने के दौरान उन्हें लक्ष्मण दास, हांडी वाले बाबा और तिकोनिया वाले बाबा जैसे नामों से भी पुकारा गया।


पिता की वजह से लौटना पड़ा घर
लंबे समय तक घर से दूर रहने के बाद उनके पिता को पता चला कि फर्रुखाबाद क्षेत्र के नीब करौरी गांव में उनके जैसा दिखने वाला एक साधु रह रहा है। वहां पहुंचकर उन्होंने अपने बेटे को पहचान लिया और घर लौटने का आग्रह किया।
पिता की बात मानकर लक्ष्मी नारायण शर्मा वापस गृहस्थ जीवन में लौटे। बाद में उनके दो बेटे और एक बेटी हुए। हालांकि, पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच भी उनका झुकाव आध्यात्मिक और सेवा कार्यों की तरफ बना रहा।
ट्रेन की घटना से जुड़ा नीब करौरी नाम
नीम करोली बाबा के नाम को लेकर सबसे चर्चित कहानी एक ट्रेन यात्रा से जुड़ी है। प्रचलित कथा के अनुसार, एक बार बाबा ट्रेन में सफर कर रहे थे, लेकिन उनके पास टिकट नहीं था। टिकट जांचने वाले कर्मचारी ने उन्हें नीब करौरी स्टेशन के पास ट्रेन से उतार दिया।
कहा जाता है कि बाबा के उतरने के बाद ट्रेन आगे नहीं बढ़ी। काफी प्रयास के बावजूद ट्रेन के नहीं चलने पर स्थानीय लोगों और रेलवे कर्मचारियों ने बाबा से दोबारा ट्रेन में बैठने का आग्रह किया। मान्यता है कि बाबा के ट्रेन में बैठने के बाद ट्रेन चल पड़ी।
इस घटना को श्रद्धालु बाबा की आध्यात्मिक शक्ति से जोड़ते हैं। इसी के बाद उन्हें नीब करौरी बाबा के नाम से पुकारे जाने की बात कही जाती है, जो आगे चलकर नीम करोली बाबा के नाम से प्रसिद्ध हुआ। हालांकि, यह घटना मुख्य रूप से लोकप्रचलित कथा के रूप में जानी जाती है।
गृहस्थ जीवन के बाद फिर चुना वैराग्य
बाबा ने कुछ समय तक परिवार की जिम्मेदारियां निभाईं। लेकिन उनका जीवन सामान्य गृहस्थ व्यक्ति की तरह नहीं रहा। वह लगातार लोगों की सहायता, साधना और धार्मिक गतिविधियों में लगे रहे।
बताया जाता है कि करीब 1958 के आसपास उन्होंने दोबारा सांसारिक जीवन से दूरी बना ली। इसके बाद उन्होंने अपना अधिकांश समय यात्राओं और आध्यात्मिक कार्यों में बिताया। उनकी पहचान सादगी और कंबल से भी जुड़ गई। मोटा कंबल ओढ़े उनकी तस्वीरें आज भी उनके अनुयायियों के बीच काफी प्रसिद्ध हैं।


ऐसे अस्तित्व में आया कैंची धाम
नीम करोली बाबा का सबसे प्रसिद्ध जुड़ाव उत्तराखंड के कैंची क्षेत्र से हुआ। करीब 1961 के आसपास वह नैनीताल के नजदीक भवाली क्षेत्र पहुंचे। पहाड़ियों और शिप्रा नदी के आसपास का वातावरण उन्हें पसंद आया।
भवाली से आगे कैंची नामक स्थान पर बाबा ने साधना और सेवा के लिए धार्मिक केंद्र विकसित किया। पूर्णानंद जी का भी इस कार्य में सहयोग बताया जाता है। वर्ष 1964 में यहां कैंची धाम आश्रम और हनुमान मंदिर के निर्माण का कार्य पूरा हुआ।
इसके बाद कैंची धाम धीरे-धीरे बाबा की आध्यात्मिक विरासत का सबसे प्रमुख केंद्र बन गया।
15 जून को जुटती है बड़ी भीड़
कैंची धाम में हर साल 15 जून को स्थापना दिवस मनाया जाता है। इस मौके पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। हनुमान जी की पूजा, प्रसाद और सेवा के बीच पूरा परिसर भक्तिमय नजर आता है।
आज कैंची धाम सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में रहने वाले बाबा के अनुयायियों के बीच भी बेहद लोकप्रिय है।


विदेशों में भी बढ़ी बाबा की पहचान
1960 और 1970 के दशक में विदेशों से भी कई लोग नीम करोली बाबा से मिलने भारत पहुंचे। अमेरिकी आध्यात्मिक शिक्षक रामदास, जिनका मूल नाम रिचर्ड अल्पर्ट था, बाबा से काफी प्रभावित हुए। उन्होंने अपने अनुभवों और बाबा की शिक्षाओं को पश्चिमी दुनिया तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बाद के वर्षों में स्टीव जॉब्स, मार्क जुकरबर्ग समेत कई चर्चित लोगों का नाम भी बाबा और कैंची धाम से जोड़ा गया। हालांकि, इन संबंधों को लेकर अलग-अलग दावे और विवरण मिलते हैं।
वृंदावन में हुआ देहांत
नीम करोली बाबा ने जीवन के अंतिम दिन वृंदावन में बिताए। 11 सितंबर 1973 को उनके शरीर त्यागने की बात कही जाती है। उनके निधन के बाद भी उनकी शिक्षाएं और सेवा की परंपरा उनके अनुयायियों के बीच जारी रही।
आज भारत के अलावा कई देशों में उनके नाम से जुड़े आश्रम और सेवा केंद्र संचालित होते हैं। कैंची धाम उनकी स्मृति और आध्यात्मिक विरासत का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है।


प्रेम और सेवा था बाबा का संदेश
नीम करोली बाबा की शिक्षाओं में प्रेम, सेवा और भक्ति को विशेष महत्व दिया जाता है। उनके अनुयायियों के अनुसार बाबा लोगों को जरूरतमंदों की मदद करने, भोजन का सम्मान करने, अहंकार से दूर रहने और भगवान का स्मरण करने की प्रेरणा देते थे।
लक्ष्मी नारायण शर्मा से नीम करोली बाबा तक की उनकी यात्रा आज भी लोगों के लिए जिज्ञासा और प्रेरणा का विषय है। उनके जीवन से जुड़ी कई घटनाएं आस्था और प्रचलित मान्यताओं पर आधारित हैं, लेकिन प्रेम, सेवा और सादगी का उनका संदेश आज भी उनके अनुयायियों को प्रभावित करता है।