Mathura Janmashtami: मथुरा में आधी रात को और गोकुल में अगले दिन क्यों मनाई जाती है जन्माष्टमी? जानिए ब्रज की अनोखी परंपरा का रहस्य
भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा और उनकी बाल लीलाओं की भूमि गोकुल में जन्माष्टमी का पर्व अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है। ब्रज की सबसे खास परंपरा यह है कि मथुरा में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव आधी रात को मनाया जाता है, जबकि गोकुल में अगले दिन नंदोत्सव के रूप में खुशियां मनाई जाती हैं। इसके पीछे भगवान कृष्ण के जन्म और उनके गोकुल पहुंचने की पौराणिक कथा जुड़ी हुई है।
मथुरा में आधी रात को क्यों मनती है जन्माष्टमी?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में मध्यरात्रि के समय मथुरा की कारागार में हुआ था। उस समय उनके माता-पिता देवकी और वसुदेव कंस के कारागार में बंद थे।
कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने देवकी के गर्भ से श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया। उनके जन्म लेते ही कारागार के पहरेदार सो गए और सभी बंधन खुल गए। इसके बाद वसुदेव भगवान कृष्ण को टोकरी में रखकर यमुना पार करते हुए गोकुल में नंद बाबा के घर लेकर पहुंचे।
इसी वजह से मथुरा में जन्माष्टमी की रात 12 बजे भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव मनाया जाता है। इस समय मंदिरों में विशेष पूजा, शंखनाद, आरती और भगवान के अभिषेक का आयोजन किया जाता है।
कृष्ण जन्मस्थान पर होता है महाभिषेक
मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मस्थान मंदिर में जन्माष्टमी का मुख्य आकर्षण मध्यरात्रि का महाभिषेक होता है। भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप का पंचामृत से अभिषेक किया जाता है।
इस दौरान मंदिर परिसर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। भगवान के जन्म के समय शंख, घंटियों और जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है। श्रद्धालु इस क्षण को भगवान के धरती पर अवतरण का शुभ समय मानते हैं।
गोकुल में अगले दिन क्यों मनाया जाता है नंदोत्सव?
मथुरा में जन्म के बाद भगवान कृष्ण को रात में ही गोकुल पहुंचा दिया गया था। वहां नंद बाबा और माता यशोदा के घर बाल कृष्ण के आने की खुशी अगले दिन पूरे गोकुल को हुई।
पौराणिक कथा के अनुसार, जब सुबह गोकुलवासियों को पता चला कि नंद बाबा के घर पुत्र जन्म हुआ है, तो पूरे गांव में उत्सव मनाया गया। नंद बाबा ने खुशी में लोगों को दान दिया और मिठाइयां बांटीं।
इसी खुशी की याद में गोकुल में जन्माष्टमी के अगले दिन नंदोत्सव मनाने की परंपरा चली आ रही है।
नंदोत्सव में दिखती है ब्रज की अनोखी संस्कृति
गोकुल के नंदोत्सव में भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा की जाती है। मंदिरों में विशेष श्रृंगार किया जाता है और भजन-कीर्तन के साथ उत्सव मनाया जाता है।
ब्रज की गलियों में श्रद्धालु कृष्ण की बाल लीलाओं को याद करते हैं। कई स्थानों पर दही-हांडी, सांस्कृतिक कार्यक्रम और धार्मिक आयोजन भी किए जाते हैं।
मथुरा और गोकुल की परंपरा का संबंध
मथुरा को भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि माना जाता है, जबकि गोकुल उनकी बाल लीला भूमि है। इसलिए दोनों स्थानों पर जन्माष्टमी मनाने की परंपरा अलग-अलग है।
मथुरा में आधी रात को कृष्ण के जन्म का उत्सव होता है, जबकि गोकुल में उनके नंद बाबा के घर पहुंचने और बाल रूप में आगमन की खुशी मनाई जाती है।
यही कारण है कि ब्रज की जन्माष्टमी दुनिया भर के श्रद्धालुओं के लिए खास आकर्षण का केंद्र रहती है। यहां भगवान कृष्ण के जन्म से लेकर उनकी बाल लीलाओं तक की पूरी कथा परंपराओं के रूप में जीवंत दिखाई देती है।