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Kalighat Kali Temple: कालीघाट मंदिर की अनोखी परंपराएं, जहां देवी को चढ़ता है मछली-मांस का भोग; साल में एक बार होता है गुप्त स्नान

 

कोलकाता का कालीघाट मंदिर मां काली के प्रमुख शक्तिपीठों में गिना जाता है। यहां देवी की पूजा से जुड़ी कई ऐसी परंपराएं हैं, जो इसे दूसरे मंदिरों से अलग बनाती हैं। मंदिर में मां काली की तीन आंखें, चार हाथ और सोने की लंबी जीभ वाली प्रतिमा विराजमान है। देवी को चावल, दाल, सब्जियों और मिठाइयों के साथ मछली, झींगा तथा बकरे के मांस का भोग भी लगाया जाता है।

इस मंदिर की एक विशेष परंपरा सती के पैर की उंगलियों से जुड़े अवशेष की पूजा है। मान्यता के अनुसार, इसे मुख्य प्रतिमा के नीचे एक सुरक्षित बक्से में रखा जाता है और साल में एक बार विशेष अनुष्ठान के दौरान स्नान कराया जाता है। दीपावली के अवसर पर यहां मां काली की पूजा महालक्ष्मी के रूप में भी की जाती है।

साल में एक बार होता है गुप्त स्नान

कालीघाट मंदिर की सबसे खास परंपराओं में स्नान यात्रा शामिल है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यहां सती के पैर की उंगलियों के रूप में पूजे जाने वाले अवशेष को देवी की मूल शक्ति का प्रतीक माना जाता है। इसे मुख्य प्रतिमा के नीचे सुरक्षित बक्से में रखा जाता है और आम श्रद्धालुओं को इसके दर्शन नहीं कराए जाते।

साल में एक बार विशेष स्नान अनुष्ठान के दौरान बक्से को खोला जाता है। इस रस्म में सेवायत परिवार के चुनिंदा सदस्य शामिल होते हैं। परंपरा के अनुसार, अनुष्ठान में शामिल पुजारी अपनी आंखों पर कपड़ा बांध लेते हैं। इसके बाद अवशेष को पवित्र जल से स्नान कराकर नए वस्त्र में लपेटा जाता है और फिर सुरक्षित रख दिया जाता है।

इस धार्मिक परंपरा को लेकर मान्यता है कि अवशेष को सीधे देखना वर्जित है। इसलिए स्नान कराने वाले पुजारी भी आंखों पर पट्टी बांधकर अनुष्ठान पूरा करते हैं।

दीपावली पर मां काली की होती है महालक्ष्मी के रूप में पूजा

पश्चिम बंगाल में दीपावली की अमावस्या पर मां काली की विशेष पूजा की जाती है। कालीघाट मंदिर में भी इस दिन अलग परंपरा निभाई जाती है। यहां मां काली की स्थायी प्रतिमा को ही महालक्ष्मी के स्वरूप में पूजने की मान्यता है। इसके लिए अलग से लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित नहीं की जाती।

पूजा से पहले देवी का स्नान और श्रृंगार किया जाता है। इसके बाद खील, मुरमुरे, लड्डू, पूरी, सब्जी, फल और मिठाइयों का शाकाहारी भोग लगाया जाता है। इस विशेष पूजा से पहले मंदिर में अलक्ष्मी विदाई की रस्म भी निभाई जाती है।

इस रस्म में सेवायत सूखे पटसन के डंठल लेकर मंदिर की परिक्रमा करते हैं और फिर फूस से बनी अलक्ष्मी की आकृति को जलाते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह अनुष्ठान घर-परिवार से दरिद्रता और दुर्भाग्य दूर करने का प्रतीक है। इसके बाद मंदिर की सफाई करके महालक्ष्मी के रूप में देवी की पूजा की जाती है।

देवी को चढ़ता है मछली, झींगा और बकरे के मांस का भोग

कालीघाट मंदिर में देवी के भोग की परंपरा भी विशेष है। यहां चावल, दाल, सब्जियां, चटनी और पायेश यानी चावल की खीर के साथ मछली, झींगा और बकरे का मांस भी अर्पित किया जाता है। रोहू और हिलसा जैसी मछलियां देवी के भोग में शामिल बताई जाती हैं।

मंदिर में बकरे की बलि की परंपरा भी है। इसके लिए नाटमंदिर के पास स्थित हरकाठ तला का इस्तेमाल किया जाता है। बलि के मांस का एक हिस्सा देवी को अर्पित किए जाने वाले भोग में शामिल किया जाता है।

सुबह मंगल आरती के बाद नियमित पूजा होती है। इस दौरान फूल, कच्चे चावल और फल चढ़ाए जाते हैं। लाल गुड़हल के फूलों की माला भी मां को अर्पित की जाती है। दोपहर में भोजन का भोग लगाते समय गर्भगृह के दरवाजे बंद रखे जाते हैं। इसी दौरान जरूरतमंदों को भोजन कराने की परंपरा को दरिद्रनारायण सेवा कहा जाता है। शाम की पूजा में मिठाई, दूध और पूरी चढ़ाई जाती है।

कालीघाट में कृष्ण पूजा की भी अनूठी परंपरा

कालीघाट मंदिर में मां काली की पूजा के साथ वैष्णव परंपरा से जुड़ी मान्यताएं भी देखने को मिलती हैं। मंदिर के गर्भगृह में भगवान वासुदेव की प्रतिमा एक आले में स्थापित है। देवी की नाक पर वैष्णव तिलक लगाने और पहले वासुदेव को नैवेद्य अर्पित करने की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है।

मंदिर परिसर में राधा-कृष्ण का अलग मंदिर है, जिसे श्यामराय मंदिर कहा जाता है। यहां राधा-कृष्ण के लिए अलग रसोई में शाकाहारी भोग तैयार किया जाता है। इस तरह मंदिर परिसर में शाक्त और वैष्णव परंपराओं का अनूठा संगम दिखाई देता है।

दुर्गा पूजा में भी निभाई जाती हैं विशेष रस्में

कालीघाट में दुर्गा पूजा के दौरान भी कई खास परंपराएं निभाई जाती हैं। यहां अलग से दुर्गा प्रतिमा स्थापित करने के बजाय गर्भगृह में विराजमान मां काली की ही दुर्गा मंत्रों के साथ चामुंडा स्वरूप में पूजा किए जाने की परंपरा बताई जाती है।

पूजा के दौरान नवपत्रिका तैयार करने, स्नान कराने, कन्या पूजन और संधि पूजा जैसे अनुष्ठान किए जाते हैं। नवपत्रिका केले, हल्दी और धान सहित नौ पौधों से बनाई जाती है। कालीघाट की परंपरा में दो नवपत्रिकाएं तैयार की जाती हैं, जिन्हें देवी के दोनों ओर स्थापित किया जाता है।

महाअष्टमी के दौरान संधि पूजा का विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी संधिकाल में देवी ने चंड-मुंड का वध किया था। महानवमी पर विशेष पूजा और बलि की रस्में निभाई जाती हैं। विजयादशमी पर विवाहित महिलाएं सिंदूर खेला करती हैं और इसके बाद नवपत्रिकाओं का विसर्जन होता है। मां काली की स्थायी प्रतिमा का विसर्जन नहीं किया जाता।

पूजा की जिम्मेदारी संभालने वाले को कहते हैं पालादार

कालीघाट मंदिर में पूजा व्यवस्था से जुड़ी एक और पुरानी परंपरा है। यहां देवी की सेवा पीढ़ियों से हलदार परिवार के सेवायत करते आए हैं। मंदिर में पूजा की बारी को ‘पाला’ और उस दिन की व्यवस्था संभालने वाले व्यक्ति को ‘पालादार’ कहा जाता है।

पालादार की जिम्मेदारी में पूजा, देवी का श्रृंगार, भोग और अन्य धार्मिक व्यवस्थाएं शामिल होती हैं। इसके लिए पुजारी, श्रृंगार करने वाले मिश्र और भोजन तैयार करने वाले रसोइयों की व्यवस्था की जाती है। फूल, घी, तेल और भोग की सामग्री का खर्च भी संबंधित पालादार के जिम्मे होता है।

मंदिर की पूजा व्यवस्था और सेवायतों के अधिकारों को लेकर कानूनी नियम भी बनाए गए हैं। वर्ष 2013 में कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश का उल्लेख करते हुए कहा जाता है कि सेवायत या पालादार अपना पूजा का अधिकार परिवार से बाहर किसी अन्य व्यक्ति को बेच या सौंप नहीं सकता।

कालीघाट मंदिर की ये परंपराएं इसे धार्मिक आस्था, प्राचीन मान्यताओं और बंगाल की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र बनाती हैं। यहां मां काली की पूजा के साथ जुड़े अलग-अलग अनुष्ठान आज भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखते हैं।