Jwala Devi Temple: बिना मूर्ति के नौ अखंड ज्योतियों की होती है पूजा, जानें मां के नौ स्वरूपों का धार्मिक महत्व
हिमाचल प्रदेश के प्रसिद्ध ज्वाला देवी मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां गर्भगृह में देवी की कोई प्रतिमा नहीं है। मंदिर में चट्टानों की दरारों से निकलने वाली प्राकृतिक ज्वालाओं को ही देवी का स्वरूप मानकर पूजा जाता है। इन नौ ज्योतियों के अलग-अलग नाम और धार्मिक महत्व हैं। इनमें महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज भवानी, विंध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अंबिका और अंजना देवी शामिल हैं।
मान्यता है कि इस स्थान पर देवी सती की जीभ गिरी थी। इसी वजह से यहां प्रज्वलित ज्वालाओं को देवी की शक्ति का प्रतीक माना जाता है। इन ज्वालाओं को जलाने के लिए तेल, घी या बाती की जरूरत नहीं होती। ये जमीन के भीतर से निकलने वाली प्राकृतिक गैस के कारण जलती हैं। इनकी लपटें नीली दिखाई देती हैं और इनका आकार व तीव्रता भी अलग-अलग रहती है।
नौ ज्योतियों में विराजमान हैं देवी के अलग-अलग स्वरूप
मंदिर के गर्भगृह में नौ ज्वालाएं अलग-अलग स्थानों पर प्रज्वलित होती हैं। मुख्य ज्योति महाकाली के नाम से पूजी जाती है। यह चांदी से जड़े आले में स्थित है। इसके नीचे अन्नपूर्णा और दूसरी ओर चंडी का स्वरूप माना जाता है। अन्य ज्योतियां गर्भगृह के अलग-अलग स्थानों और पवित्र कुंड में हैं।
- महाकाली: मंदिर की मुख्य ज्योति। इन्हें भक्ति और मुक्ति प्रदान करने वाली शक्ति माना जाता है।
- अन्नपूर्णा: अन्न, पोषण और परिवार के कल्याण की देवी।
- चंडी: बुरी शक्तियों और शत्रुओं का नाश करने वाली देवी।
- हिंगलाज भवानी: संकटों और बाधाओं से मुक्ति की कामना के साथ इनकी पूजा होती है।
- विंध्यवासिनी: दुख और शोक दूर करने वाली शक्ति के रूप में इनकी मान्यता है।
- महालक्ष्मी: धन, वैभव और समृद्धि की देवी।
- सरस्वती: विद्या, ज्ञान और बुद्धि प्राप्ति के लिए इनकी आराधना की जाती है।
- अंबिका: संतान प्राप्ति और बच्चों के कल्याण की कामना से इनकी पूजा होती है।
- अंजना देवी: आयु और सुख-समृद्धि से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं में इनका विशेष स्थान है।
नवरात्रि में विशेष पूजा, हवन और कन्या पूजन
शारदीय नवरात्रि के दौरान ज्वाला देवी मंदिर में विशेष धार्मिक आयोजन किए जाते हैं। परंपरा के अनुसार, उत्सव की शुरुआत मंदिर में झंडा चढ़ाने की रस्म से होती है। इसके बाद देवी की विशेष आराधना, हवन, यज्ञ और कन्या पूजन किया जाता है। इस दौरान मंदिर को फूलों से सजाया जाता है और नौ प्राकृतिक ज्योतियों की विशेष पूजा होती है।
नवरात्रि में श्रद्धालुओं के लिए तीन बार मुफ्त लंगर की व्यवस्था भी की जाती है। भक्त देवी के दर्शन करने के साथ धार्मिक अनुष्ठानों में हिस्सा लेते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
देवताओं के साथ पितरों के लिए भी होते हैं अनुष्ठान
ज्वाला देवी मंदिर में देवी की पूजा के साथ देवताओं और पितरों के लिए भी विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। हवन में देवताओं को आहुति देते समय ‘स्वाहा’ और पितरों के लिए आहुति देते समय ‘स्वधा’ बोला जाता है।
मंदिर के मुख्य द्वार पर बने योगिनी कुंड में खप्पर पूजा की परंपरा भी है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रद्धालु इन अनुष्ठानों के माध्यम से पितृ दोष और वास्तु दोष से मुक्ति की कामना करते हैं।
भोजक परिवार के पास पीढ़ियों से पूजा की जिम्मेदारी
ज्वाला देवी मंदिर की स्थापना से जुड़ी एक प्रचलित कथा राजा भूमिचंद से संबंधित है। मान्यता है कि राजा की गाय जंगल में चरने जाती थी, लेकिन शाम को उसका दूध कम हो जाता था। जांच करने पर पता चला कि एक छोटी कन्या गाय का दूध पी लेती है। इसके बाद उस स्थान की खोज की गई, जहां चट्टानों से प्राकृतिक ज्वालाएं निकलती मिलीं। मान्यता के अनुसार, राजा ने इसी स्थान पर मंदिर बनवाया।
मंदिर की परंपरा के मुताबिक, देवी की पूजा के लिए शाकद्वीप से भोजक वंश के ब्राह्मणों को बुलाया गया था। उनके वंशज आज भी मंदिर की पूजा व्यवस्था से जुड़े हुए हैं।
यहां पुजारी बनने के लिए परिवार में जन्म लेना ही पर्याप्त नहीं माना जाता। परंपरा के अनुसार, विवाह के बाद पिता से दीक्षा प्राप्त करने पर ही मुख्य पूजा का अधिकार मिलता है। इस तरह मंदिर में धार्मिक अनुष्ठानों की जिम्मेदारी पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही है।
ज्वाला देवी मंदिर अपनी प्राकृतिक ज्योतियों, प्राचीन धार्मिक परंपराओं और नवरात्रि के विशेष आयोजनों के कारण देशभर के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां देवी की प्रतिमा के बजाय अग्नि की लपटों को शक्ति का स्वरूप मानकर पूजा जाता है।