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Jagannath Rath Yatra 2026: 5,000 साल से भी पुरानी है भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा, जानिए राजा इंद्रद्युम, विश्वकर्मा और अधूरी मूर्तियों की अद्भुत कथा

 

 भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा का विशेष स्थान है। ओडिशा के पुरी में निकलने वाली यह भव्य यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और संस्कृति का अद्भुत संगम मानी जाती है। मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा की परंपरा हजारों साल पुरानी है और इसका संबंध भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण से जुड़ा हुआ है। हर साल लाखों श्रद्धालु इस दिव्य यात्रा के दर्शन के लिए पुरी पहुंचते हैं।

कैसे हुई भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा की शुरुआत?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पुरी में भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की पूजा की जाती है। रथ यात्रा के दौरान तीनों देवी-देवता भव्य रथों पर सवार होकर नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं और गुंडिचा मंदिर तक जाते हैं। इसे भगवान के अपने भक्तों के बीच आने का प्रतीक माना जाता है।

कहा जाता है कि भगवान जगन्नाथ अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए स्वयं मंदिर से बाहर आते हैं। यही कारण है कि इस यात्रा को देखने और रथ खींचने का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है।

राजा इंद्रद्युम की कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, मालवा के राजा इंद्रद्युम भगवान विष्णु के परम भक्त थे। उन्हें एक दिन भगवान नील माधव के बारे में जानकारी मिली, जिनकी पूजा एक वनवासी राजा विश्ववसु करते थे। राजा इंद्रद्युम ने भगवान के दर्शन करने की इच्छा जताई और अपने दूत विद्यापति को नील माधव की खोज के लिए भेजा।

कई प्रयासों के बाद विद्यापति को भगवान नील माधव के दर्शन हुए। इसके बाद राजा इंद्रद्युम ने भगवान की मूर्ति स्थापित करने का संकल्प लिया। मान्यता है कि भगवान विष्णु ने उन्हें समुद्र तट पर मिले एक दिव्य लकड़ी के लट्ठे से मूर्ति बनाने का निर्देश दिया।

विश्वकर्मा और अधूरी मूर्तियों की कहानी

धार्मिक कथाओं के अनुसार, भगवान की मूर्तियां बनाने का कार्य स्वयं देव शिल्पी विश्वकर्मा ने स्वीकार किया। उन्होंने राजा इंद्रद्युम के सामने शर्त रखी कि जब तक मूर्तियां पूरी न हो जाएं, तब तक कोई भी कमरे का दरवाजा नहीं खोलेगा।

कई दिनों तक अंदर से कोई आवाज नहीं आई। राजा को चिंता होने लगी और उन्होंने अधीर होकर दरवाजा खुलवा दिया। दरवाजा खुलने पर देखा गया कि भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां अधूरी थीं। उनके हाथ-पैर पूरी तरह निर्मित नहीं थे।

मान्यता है कि भगवान की इच्छा के कारण ही यह स्वरूप अधूरा रहा और आज भी पुरी मंदिर में भगवान जगन्नाथ की मूर्ति इसी विशेष रूप में विराजमान है।

तीन रथों का होता है विशेष महत्व

पुरी रथ यात्रा में तीन विशाल रथ बनाए जाते हैं। भगवान जगन्नाथ के रथ का नाम नंदीघोष, भगवान बलभद्र के रथ का नाम तालध्वज और देवी सुभद्रा के रथ का नाम दर्पदलन है। इन रथों को विशेष लकड़ियों से तैयार किया जाता है और हर साल नए रथ बनाए जाते हैं।

रथ यात्रा का धार्मिक महत्व

हिंदू धर्म में मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा के दर्शन करने और रथ की रस्सी खींचने से पुण्य की प्राप्ति होती है। यह यात्रा भक्त और भगवान के बीच सीधे संबंध का प्रतीक मानी जाती है। इसमें जाति, धर्म और सामाजिक भेदभाव से ऊपर उठकर सभी लोग शामिल होते हैं।

पुरी की जगन्नाथ रथ यात्रा आज भी भारत की सबसे बड़ी धार्मिक यात्राओं में से एक है, जो हजारों वर्षों से चली आ रही आस्था और परंपरा को जीवंत बनाए हुए है।