Jagannath Rath Yatra 2026: कैसे बनी भगवान जगन्नाथ की मूर्ति? जानें राजा के सपने और दिव्य कथा की पूरी कहानी
भारत की प्राचीन धार्मिक परंपराओं में जगन्नाथ रथ यात्रा का विशेष महत्व है। हर साल ओडिशा के पुरी स्थित प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर से भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की भव्य रथ यात्रा निकाली जाती है। साल 2026 में होने वाली रथ यात्रा को लेकर भी श्रद्धालुओं में काफी उत्साह है।
भगवान जगन्नाथ की मूर्तियां अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं से काफी अलग हैं। उनकी बड़ी आंखें, अधूरे हाथ-पैर और लकड़ी से बनी प्रतिमा भक्तों के बीच आस्था का केंद्र है। इन मूर्तियों के निर्माण को लेकर एक बेहद प्रसिद्ध पौराणिक कथा जुड़ी हुई है।
राजा इंद्रद्युम्न को आया था भगवान विष्णु का सपना
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के निर्माण की कहानी मालवा के राजा इंद्रद्युम्न से जुड़ी है। कहा जाता है कि राजा इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के परम भक्त थे और उनके मन में भगवान के दिव्य स्वरूप के दर्शन की इच्छा थी।
एक दिन राजा को सपने में भगवान विष्णु के दर्शन हुए। भगवान ने उन्हें बताया कि समुद्र के किनारे एक दिव्य लकड़ी (दारु ब्रह्म) मिलेगी, जिससे उनकी प्रतिमा का निर्माण किया जाएगा।
भगवान विष्णु ने राजा को निर्देश दिया कि उस पवित्र लकड़ी से भगवान के विशेष स्वरूप की मूर्तियां बनवाई जाएं।
समुद्र किनारे मिली दिव्य लकड़ी
कथा के अनुसार, राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान के आदेश के बाद समुद्र तट पर खोज शुरू करवाई। वहां उन्हें एक विशेष लकड़ी का टुकड़ा मिला, जिसे दिव्य माना गया।
इसके बाद राजा ने मूर्ति बनाने के लिए एक दिव्य शिल्पकार की तलाश की। मान्यता है कि स्वयं भगवान विश्वकर्मा एक वृद्ध कारीगर के रूप में राजा के सामने आए।
विश्वकर्मा ने रखी थी एक शर्त
कहानी के अनुसार, वृद्ध कारीगर ने राजा से कहा कि वह मूर्तियां बनाएंगे, लेकिन निर्माण कार्य पूरा होने तक कोई भी कमरे का दरवाजा नहीं खोलेगा।
राजा ने उनकी बात मान ली। कई दिनों तक कमरे के अंदर से काम करने की आवाज आती रही, लेकिन कुछ समय बाद आवाजें आनी बंद हो गईं।
राजा को चिंता हुई और उन्होंने दरवाजा खुलवा दिया। जब कमरा खोला गया तो मूर्तियां पूरी तरह तैयार नहीं थीं। भगवान विश्वकर्मा वहां मौजूद नहीं थे और भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां अधूरे हाथ-पैर के रूप में दिखाई दीं।
अधूरे स्वरूप में ही हुई पूजा शुरू
राजा इंद्रद्युम्न ने इसे भगवान की इच्छा मानकर उसी स्वरूप में मूर्तियों की स्थापना कर दी। मान्यता है कि भगवान ने स्वयं इसी रूप में भक्तों को दर्शन देने का निर्णय लिया था।
इसी कारण पुरी के जगन्नाथ मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की लकड़ी की मूर्तियां अन्य प्रतिमाओं से अलग दिखाई देती हैं।
जगन्नाथ रथ यात्रा का महत्व
रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा अपने मंदिर से निकलकर गुंडिचा मंदिर जाते हैं। इस यात्रा को भगवान के भक्तों तक पहुंचने का प्रतीक माना जाता है।
धार्मिक मान्यता है कि रथ की रस्सी खींचने मात्र से भक्तों को पुण्य की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु इस भव्य यात्रा में शामिल होने पहुंचते हैं।
भगवान जगन्नाथ की मूर्ति निर्माण की यह कथा केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और भक्ति की गहरी भावना को भी दर्शाती है।