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Dwarka Mystery: समुद्र में कैसे समा गई भगवान कृष्ण की द्वारका? क्या आज भी पानी के नीचे मौजूद है सोना?
 

 

नई दिल्ली: भगवान श्रीकृष्ण की नगरी द्वारका भारतीय धार्मिक परंपरा और इतिहास से जुड़ी सबसे चर्चित जगहों में शामिल है। धार्मिक ग्रंथों में द्वारका को एक भव्य और समृद्ध नगरी के रूप में वर्णित किया गया है, जिसका निर्माण समुद्र के किनारे भगवान श्रीकृष्ण के लिए कराया गया था। समय के साथ यह मान्यता प्रचलित हुई कि श्रीकृष्ण के पृथ्वी से प्रस्थान के बाद द्वारका समुद्र में समा गई।


द्वारका के डूबने की कहानी जहां महाभारत और अन्य धार्मिक ग्रंथों से जुड़ी है, वहीं समुद्री पुरातत्व और भू-विज्ञान इस पूरे विषय को प्राकृतिक बदलावों के नजरिए से देखते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर द्वारका के साथ क्या हुआ और क्या समुद्र के नीचे आज भी कोई खजाना मौजूद है?
धार्मिक ग्रंथों में कैसी है द्वारका की कहानी?
हिंदू धार्मिक परंपराओं के अनुसार, श्रीकृष्ण ने मथुरा छोड़ने के बाद पश्चिमी तट पर द्वारका नगरी बसाई थी। इसे यदुवंश का प्रमुख केंद्र बताया गया है। धार्मिक कथाओं में द्वारका को विशाल महलों, मजबूत द्वारों और बेहद समृद्ध जीवन वाली नगरी के रूप में चित्रित किया गया है।
कई वर्णनों में इसकी भव्यता इतनी अधिक बताई गई है कि इसे सोने की नगरी के रूप में भी याद किया जाता है। हालांकि, इन वर्णनों को धार्मिक और साहित्यिक संदर्भ में समझना जरूरी है।


गांधारी के श्राप से जुड़ी है एक मान्यता
महाभारत की कथा के अनुसार, युद्ध के बाद गांधारी अपने पुत्रों की मृत्यु से बेहद दुखी थीं। उन्होंने इसके लिए श्रीकृष्ण को भी जिम्मेदार माना और उन्हें श्राप दिया कि जिस तरह कुरु वंश का विनाश हुआ, उसी तरह एक समय यदुवंश का भी अंत होगा।
धार्मिक मान्यता के मुताबिक आगे चलकर यदुवंश में आपसी संघर्ष हुआ और उसका विनाश हो गया। इसके बाद श्रीकृष्ण के पृथ्वी से प्रस्थान के साथ द्वारका के समुद्र में समा जाने की कथा जुड़ी हुई है।
सांब और ऋषियों के श्राप की कहानी
द्वारका के विनाश से जुड़ी एक दूसरी प्रसिद्ध कथा श्रीकृष्ण के पुत्र सांब से संबंधित है। कहा जाता है कि सांब और कुछ अन्य यदुवंशी युवकों ने ऋषियों के साथ मजाक किया। उन्होंने सांब को गर्भवती महिला के रूप में प्रस्तुत कर ऋषियों से पूछा कि वह पुत्र को जन्म देगा या पुत्री को।
इस छल से नाराज ऋषियों ने सांब को श्राप दिया। कथा के अनुसार उसके गर्भ से लोहे का मूसल निकला, जिसे बाद में यदुवंश के विनाश का कारण माना गया। धार्मिक परंपरा में इस घटना को द्वारका के अंतिम दौर से जोड़कर देखा जाता है।


विज्ञान द्वारका के डूबने को कैसे देखता है?
धार्मिक मान्यताओं से अलग आधुनिक विज्ञान इस घटना की संभावित व्याख्या प्राकृतिक और भूवैज्ञानिक बदलावों के आधार पर करता है।
गुजरात का पश्चिमी तट लंबे समय से समुद्री और भूगर्भीय गतिविधियों से प्रभावित रहा है। समुद्र के स्तर में बदलाव, तटीय क्षरण, भूकंपीय गतिविधियां और संभावित सुनामी जैसी घटनाएं प्राचीन तटीय बस्तियों को प्रभावित कर सकती हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह कहना मुश्किल है कि कोई पूरा शहर अचानक एक ही घटना में समुद्र के भीतर चला गया। इसके बजाय अलग-अलग समय में हुए पर्यावरणीय और भूवैज्ञानिक बदलावों ने तटीय बस्तियों के डूबने या उनके हिस्सों के समुद्र में जाने में भूमिका निभाई हो सकती है।


क्या समुद्र के नीचे आज भी मौजूद है द्वारका का सोना?
द्वारका को लेकर सबसे ज्यादा उत्सुकता उसके कथित खजाने और सोने को लेकर रहती है। धार्मिक वर्णनों में इसकी समृद्धि और भव्यता का उल्लेख मिलता है, लेकिन समुद्र के नीचे बड़ी मात्रा में सोना मौजूद होने की कोई पुरातात्विक पुष्टि नहीं हुई है।
इसलिए द्वारका को 'सोने की नगरी' कहना अधिकतर उसके वैभव और समृद्धि के धार्मिक-साहित्यिक वर्णन के तौर पर देखा जाता है। अब तक समुद्री खोजों से ऐसा कोई प्रमाण सामने नहीं आया है, जिससे यह साबित हो कि समुद्र के भीतर भारी मात्रा में सोना दबा हुआ है।
समुद्र के नीचे क्या-क्या मिला?
गुजरात के तट और द्वारका के आसपास समुद्री पुरातत्व से जुड़ी खोजों ने इस क्षेत्र को खासा महत्वपूर्ण बनाया है। ओखा और बेट द्वारका के आसपास पानी के नीचे कई तरह के पुरातात्विक अवशेष मिलने की रिपोर्ट सामने आती रही है।
इन खोजों में पत्थर की संरचनाएं, प्राचीन पत्थर के लंगर, मिट्टी के बर्तन, वास्तुकला से जुड़े अवशेष, मूर्तियां, सिक्के और मुहर जैसी वस्तुएं शामिल हैं। ये अवशेष इस क्षेत्र में प्राचीन समय में मानव गतिविधियों और समुद्री संपर्क की ओर संकेत करते हैं।
हालांकि, किसी भी पुरातात्विक अवशेष को सीधे धार्मिक ग्रंथों में वर्णित श्रीकृष्ण की द्वारका के रूप में पहचानने के लिए पर्याप्त और निर्णायक प्रमाण की जरूरत होती है।


आस्था और विज्ञान के बीच आज भी कायम है रहस्य
द्वारका की कहानी आज भी धार्मिक आस्था, पुरातत्व और भू-विज्ञान के बीच एक दिलचस्प विषय बनी हुई है। धार्मिक ग्रंथ इसे श्रीकृष्ण की दिव्य नगरी और उसके विनाश से जोड़ते हैं, जबकि वैज्ञानिक शोध समुद्री स्तर, तटीय बदलाव और प्राकृतिक आपदाओं जैसी संभावनाओं पर विचार करता है।
यही वजह है कि समुद्र के नीचे मिली प्राचीन संरचनाएं द्वारका के रहस्य को और गहरा करती हैं, लेकिन सोने के विशाल भंडार या पूरी पौराणिक नगरी की पहचान को लेकर अभी भी कई सवाल अनसुलझे हैं।