दूर्वाष्टमी व्रत 2026: संतान सुख के लिए रखा जाता है यह व्रत, जानें नियम और महत्व
हिंदू धर्म में दूर्वाष्टमी व्रत का विशेष महत्व बताया गया है। यह व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान गणेश और दूर्वा घास की पूजा की जाती है। मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से दूर्वाष्टमी व्रत करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
दूर्वाष्टमी व्रत का महत्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार दूर्वा घास को पवित्र और शुभ माना गया है। भगवान गणेश को दूर्वा विशेष रूप से प्रिय मानी जाती है। कहा जाता है कि जो महिलाएं संतान की कामना और परिवार की खुशहाली के लिए इस व्रत को करती हैं, उन्हें पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
दूर्वाष्टमी व्रत के नियम
- इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान कर व्रत का संकल्प लिया जाता है।
- भगवान गणेश और दूर्वा घास की विधि-विधान से पूजा की जाती है।
- पूजा में दूर्वा, अक्षत, फूल, दीप और नैवेद्य अर्पित किया जाता है।
- व्रत के दौरान सात्विक भोजन का पालन किया जाता है।
- शाम के समय पूजा और कथा सुनने के बाद व्रत का पारण किया जाता है।
दूर्वा पूजा की विधि
- पूजा स्थान की साफ-सफाई करें।
- भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित कर उन्हें दूर्वा अर्पित करें।
- गणेश मंत्रों का जाप करें और व्रत कथा सुनें।
- परिवार की सुख-शांति और संतान की कामना से प्रार्थना करें।
दूर्वाष्टमी पर क्या करें और क्या न करें?
क्या करें:
- भगवान गणेश की आराधना करें।
- जरूरतमंदों को दान दें।
- घर में सकारात्मक वातावरण बनाए रखें।
क्या न करें:
- दूर्वा को पैरों से न छुएं।
- पूजा के दौरान क्रोध और नकारात्मक विचारों से बचें।
- तामसिक भोजन का सेवन न करें।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमों के साथ दूर्वाष्टमी व्रत करता है, उसे जीवन में सुख-समृद्धि और संतान संबंधी शुभ फल प्राप्त होते हैं।