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Dev Uthani: दिवाली बाद देवउठनी एकादशी कब है? जानें सही तारीख, पूजन मुहूर्त और व्रत पारण का समय
 

 

दिवाली के बाद हिंदू धर्म में देवउठनी एकादशी का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की योग निद्रा से जागते हैं। इसी के साथ चातुर्मास समाप्त हो जाता है और विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन सहित अन्य मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो जाती है। साल 2026 में देवउठनी एकादशी 20 नवंबर, शुक्रवार को मनाई जाएगी। इसे देवोत्थान एकादशी और प्रबोधिनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में योग निद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद चार महीने तक मांगलिक कार्यों पर विराम रहता है। कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी पर भगवान विष्णु के जागने के साथ ही यह अवधि समाप्त हो जाती है।

कब से कब तक रहेगी देवउठनी एकादशी तिथि?

हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 20 नवंबर 2026 को सुबह 7 बजकर 16 मिनट से शुरू होगी। इसका समापन 21 नवंबर को सुबह 6 बजकर 32 मिनट पर होगा।

उदयातिथि और पंचांग के नियम के अनुसार गृहस्थ यानी स्मार्त परंपरा के लोग 20 नवंबर, शुक्रवार को देवउठनी एकादशी का व्रत रखेंगे। वहीं वैष्णव संप्रदाय के कुछ अनुयायी 21 नवंबर को व्रत रखेंगे। इसलिए व्रत रखने से पहले अपनी परंपरा के अनुसार पंचांग देखना जरूरी है।

देवउठनी एकादशी 2026 पूजा का शुभ मुहूर्त

जयपुर के पंचांग के अनुसार, 20 नवंबर को अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 51 मिनट से दोपहर 12 बजकर 34 मिनट तक रहेगा। इस दौरान भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करना शुभ माना जाता है।

शाम के समय प्रदोष काल में भी भगवान विष्णु को योग निद्रा से जगाने की परंपरा है। इस दौरान घरों और मंदिरों में दीपक जलाए जाते हैं और शंख तथा घंटियां बजाकर भगवान की आराधना की जाती है।

कब करें देवउठनी एकादशी व्रत का पारण?

एकादशी व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी तिथि में किया जाता है। जयपुर में 21 नवंबर 2026 को व्रत पारण का समय दोपहर 1 बजकर 17 मिनट से 3 बजकर 26 मिनट तक रहेगा।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, हरि वासर समाप्त होने के बाद ही व्रत का पारण करना चाहिए। पारण के दौरान भगवान विष्णु को भोग लगाकर भोजन ग्रहण किया जाता है।

देवउठनी एकादशी पर कैसे करें पूजा?

  1. सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ कपड़े पहनें।

  2. घर के मंदिर में भगवान विष्णु की पूजा करें।

  3. भगवान को पीले फूल, फल, धूप और दीप अर्पित करें।

  4. भगवान विष्णु को तुलसी दल चढ़ाएं।

  5. देवउठनी एकादशी की व्रत कथा सुनें और विष्णु मंत्रों का जाप करें।

  6. शाम को भगवान विष्णु को प्रतीकात्मक रूप से योग निद्रा से जगाएं।

  7. जरूरतमंद लोगों को भोजन और वस्त्र दान करें।

21 नवंबर को होगा तुलसी विवाह

देवउठनी एकादशी के अगले दिन 21 नवंबर को तुलसी विवाह मनाया जाएगा। इस दिन माता तुलसी और भगवान शालिग्राम का विवाह कराया जाता है। मान्यता है कि तुलसी विवाह कराने से घर में सुख-समृद्धि आती है और वैवाहिक जीवन में खुशहाली बनी रहती है। कई स्थानों पर स्थानीय परंपरा के अनुसार एकादशी के दिन भी तुलसी विवाह कराया जाता है।

देवउठनी एकादशी का धार्मिक महत्व

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के जागने के साथ ही सृष्टि में मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है। इस दिन व्रत रखने और भगवान विष्णु की पूजा करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। यही वजह है कि देशभर में श्रद्धालु इस दिन उपवास रखते हैं और मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।