छोटी दिवाली 2026: क्यों मनाई जाती है नरक चतुर्दशी? जानिए भगवान कृष्ण और नरकासुर के वध की पौराणिक कथा, पूजा विधि और इस दिन किए जाने वाले खास काम
दिवाली का पांच दिवसीय पर्व धनतेरस के साथ शुरू हो चुका है। इस साल दीपावली 8 नवंबर, रविवार को मनाई जाएगी। इससे एक दिन पहले छोटी दिवाली का त्योहार पड़ता है, जिसे नरक चतुर्दशी और रूप चौदस के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, छोटी दिवाली का संबंध भगवान श्रीकृष्ण और राक्षस नरकासुर की कथा से जुड़ा है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान कृष्ण ने नरकासुर का वध कर उसके बंदीगृह में कैद हजारों महिलाओं को आजाद कराया था। इस जीत की खुशी में लोगों ने दीपक जलाकर उत्सव मनाया था। तभी से नरक चतुर्दशी पर दीपदान और विशेष स्नान की परंपरा चली आ रही है। आइए जानते हैं नरक चतुर्दशी की पौराणिक कथा और इस दिन किए जाने वाले खास धार्मिक कार्यों के बारे में।
नरक चतुर्दशी की पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन समय में भौमासुर नाम का एक शक्तिशाली राक्षस था, जिसे नरकासुर के नाम से भी जाना जाता था। उसने अपनी ताकत के घमंड में देवताओं और आम लोगों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया था। उसने देवताओं की कई बहुमूल्य वस्तुएं छीन ली थीं और पृथ्वी के अलग-अलग राज्यों से हजारों कन्याओं का अपहरण कर उन्हें बंदी बना लिया था।
नरकासुर के अत्याचारों से परेशान होकर एक दिन देवराज इंद्र भगवान श्रीकृष्ण के पास पहुंचे। उन्होंने श्रीकृष्ण को पूरी स्थिति बताई और राक्षस के आतंक से देवताओं तथा आम लोगों को मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की।
इंद्र की बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ गरुड़ पर सवार होकर नरकासुर के नगर प्रागज्योतिषपुर पहुंचे। वहां पहुंचकर भगवान कृष्ण ने सबसे पहले मुर नाम के राक्षस और उसके छह पुत्रों का वध किया। जब नरकासुर को इसकी जानकारी मिली तो वह अपनी विशाल सेना के साथ युद्ध करने के लिए मैदान में आ गया।
कथा के अनुसार, नरकासुर को यह वरदान मिला था कि उसकी मृत्यु एक स्त्री के हाथों होगी। युद्ध के दौरान भगवान कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को सारथी बनाया। आखिरकार सत्यभामा की सहायता से नरकासुर का अंत कर दिया गया। इसके बाद भगवान कृष्ण ने नरकासुर के पुत्र भगदत्त को अभयदान देकर प्रागज्योतिषपुर का राजा बना दिया।
मान्यता है कि जिस दिन नरकासुर का वध हुआ, उस दिन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि थी। इसी कारण इस दिन को नरक चतुर्दशी कहा जाने लगा। कहा जाता है कि भगवान कृष्ण ने नरकासुर की कैद से लगभग 16 हजार महिलाओं को भी मुक्त कराया था। इस खुशी में लोगों ने घरों में दीपक जलाए और दीपदान किया। यही परंपरा आगे चलकर छोटी दिवाली के उत्सव का हिस्सा बन गई।
छोटी दिवाली पर क्यों किया जाता है तेल और उबटन से स्नान?
नरक चतुर्दशी पर सुबह सूर्योदय से पहले तेल लगाकर स्नान करने की विशेष परंपरा है। इसे अभ्यंग स्नान या नरक स्नान कहा जाता है। धार्मिक कथा के अनुसार, नरकासुर के वध के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अपने शरीर पर लगे रक्त के निशान साफ करने के लिए तेल से स्नान किया था।
इसी मान्यता के चलते छोटी दिवाली पर लोग शरीर पर तेल और उबटन लगाकर स्नान करते हैं। इसे शुभता, सुंदरता और शुद्धता से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से स्नान करने से नरक के भय से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
छोटी दिवाली पर क्या करें?
1. सूर्योदय से पहले अभ्यंग स्नान करें: छोटी दिवाली के दिन सुबह जल्दी उठकर शरीर पर तेल लगाएं और स्नान करें। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन अभ्यंग स्नान करना शुभ माना जाता है।
2. घर की साफ-सफाई करें: इस दिन घर के मुख्य दरवाजे, आंगन और पूजा स्थल की अच्छी तरह सफाई करें। मान्यता है कि साफ-सुथरे घर में सकारात्मकता का संचार होता है।
3. शाम को दीपक जलाएं: छोटी दिवाली की शाम घर के मुख्य दरवाजे, आंगन और पूजा स्थल पर दीपक जलाएं। कई जगहों पर इस दिन यमराज के नाम से भी दीपक जलाने की परंपरा है, जिसे यम दीपदान कहा जाता है।
4. भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करें: नरक चतुर्दशी का संबंध भगवान कृष्ण से माना जाता है। इसलिए इस दिन श्रद्धा के साथ भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना करें और परिवार की सुख-शांति की कामना करें।
5. रंगोली और फूलों से घर सजाएं: छोटी दिवाली पर घर के दरवाजे और आंगन में रंगोली बनाना शुभ माना जाता है। इसके साथ ही फूलों और दीपकों से घर को सजाया जाता है।
6. परिवार के साथ खुशियां बांटें: इस दिन परिवार के सदस्यों के साथ समय बिताएं, मिठाइयां बांटें और जरूरतमंद लोगों की मदद करें। छोटी दिवाली का पर्व खुशियां बांटने और बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देता है।
इस तरह छोटी दिवाली केवल दीपक जलाने का त्योहार नहीं है, बल्कि यह बुराई पर अच्छाई की जीत, अन्याय से मुक्ति और जीवन में नई सकारात्मकता लाने का प्रतीक भी माना जाता है।