Ambaji Temple: बिना मूर्ति के होती है मां अंबा की पूजा, जानें श्री वीसा यंत्र, 51 शक्तिपीठ और मोहनथाल का रहस्य
गुजरात के प्रसिद्ध अंबाजी मंदिर की धार्मिक परंपराएं इसे दूसरे मंदिरों से अलग पहचान देती हैं। यहां गर्भगृह में देवी की पारंपरिक मूर्ति के बजाय सोने की परत वाले श्री वीसा यंत्र की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस यंत्र के सीधे दर्शन नहीं किए जाते, बल्कि इसे वस्त्र, मुकुट और आभूषणों से सजाकर देवी का स्वरूप बनाया जाता है। मंदिर से कुछ किलोमीटर दूर स्थित गब्बर पहाड़ी भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष धार्मिक महत्व रखती है।
गर्भगृह में मूर्ति नहीं, श्री वीसा यंत्र की पूजा
अंबाजी मंदिर के गर्भगृह की दीवार में बने एक विशेष स्थान को ‘गोख’ कहा जाता है। इसी में श्री वीसा यंत्र स्थापित है। मंदिर की परंपरा के अनुसार, यंत्र के सीधे दर्शन और उसकी तस्वीर लेने की अनुमति नहीं है। पूजा के दौरान पुजारी आंखों पर पट्टी बांधकर अनुष्ठान करते हैं, ऐसी मान्यता प्रचलित है।
यंत्र के ऊपरी हिस्से को वस्त्र, मुकुट और आभूषणों से सजाया जाता है। श्रद्धालु इसी सजे हुए स्वरूप में मां अंबा के दर्शन करते हैं। इस परंपरा के कारण मंदिर में देवी की आराधना का तरीका विशेष माना जाता है।
सुबह बालिका, दोपहर में युवती और शाम को वृद्धा का स्वरूप
अंबाजी मंदिर में देवी के श्रृंगार से जुड़ी एक खास परंपरा भी बताई जाती है। दिन के अलग-अलग समय पर माता का स्वरूप बदलकर सजाया जाता है।
- सुबह: बालिका के रूप में श्रृंगार।
- दोपहर: युवती के स्वरूप में सजावट।
- शाम: वृद्ध महिला के रूप में श्रृंगार।
इन तीनों अवस्थाओं के अनुसार वस्त्र और आभूषण बदले जाते हैं। इस तरह श्रद्धालुओं को एक ही देवी के अलग-अलग रूपों के दर्शन करने का अवसर मिलता है।
सप्ताह के सातों दिन बदलता है देवी का वाहन
मंदिर में दिन के अनुसार देवी के वाहन का श्रृंगार किए जाने की परंपरा भी प्रचलित है। मान्यता के अनुसार, अलग-अलग वार में अलग वाहन सजाया जाता है।
- रविवार: बाघ
- सोमवार: नंदी
- मंगलवार: सिंह
- बुधवार: ऊंची सूंड वाला ऐरावत हाथी
- गुरुवार: गरुड़
- शुक्रवार: हंस
- शनिवार: नीचे की ओर सूंड वाला ऐरावत
इस परंपरा के जरिए मंदिर में देवी के श्रृंगार को हर दिन एक अलग रूप दिया जाता है।
गब्बर पहाड़ी को माना जाता है देवी का मूल स्थान
अंबाजी मंदिर से लगभग 3 से 4 किलोमीटर दूर गब्बर पहाड़ी स्थित है। धार्मिक मान्यता में इसे मां अंबा का मूल स्थान माना जाता है। पहाड़ी के आसपास 51 शक्तिपीठों के स्वरूपों की प्रतिकृतियां बनाई गई हैं, ताकि श्रद्धालु एक ही परिसर में विभिन्न शक्तिपीठों से जुड़ी परंपराओं को जान सकें।
परिक्रमा मार्ग की लंबाई लगभग 2.85 किलोमीटर बताई जाती है। पूरी परिक्रमा में करीब तीन घंटे लग सकते हैं। परिसर में मंदिरों के समूह, गुफाएं और अखंड ज्योति भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र हैं।
अरावली की पहाड़ियों में स्थित है अंबाजी मंदिर
अंबाजी मंदिर गुजरात की अरावली पर्वतमाला की आरासुर पहाड़ियों में स्थित है। इसी वजह से देवी को ‘आरासुरी अंबा’ भी कहा जाता है। मंदिर के पास मानसरोवर कुंड है, जिसके चारों ओर सीढ़ियां बनी हुई हैं। कुंड के किनारे महादेव और अजय देवी के मंदिर भी स्थित हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, अजय देवी को मां अंबा की बहन माना जाता है।
नवरात्रि में घट स्थापना से लेकर ज्वारों के उत्थापन तक अनुष्ठान
नवरात्रि के दौरान अंबाजी मंदिर में घट स्थापना, जौ बोने और विशेष आरती की परंपरा है। जौ से निकलने वाले अंकुरों को ज्वारे कहा जाता है। नवरात्रि के दिनों में इनकी पूजा और आरती की जाती है।
दुर्गाष्टमी पर विशेष आरती और ज्वारों के उत्थापन से जुड़ा अनुष्ठान होता है। इसके बाद विजयादशमी पर शमी के पेड़ का पूजन किया जाता है। इन आयोजनों की सटीक तारीख और समय के लिए मंदिर ट्रस्ट की आधिकारिक सूचना देखना जरूरी है।
शरद पूर्णिमा पर दूध-पोहे का भोग
शारदीय नवरात्रि के बाद शरद पूर्णिमा पर भी मंदिर में विशेष पूजा की परंपरा है। इस अवसर पर मां अंबा को दूध-पोहे का भोग अर्पित किया जाता है और कपूर से आरती की जाती है।
दूध-पोहा दूध और चपटे चावल यानी पोहे से तैयार किया जाता है। गुजरात में शरद पूर्णिमा पर इसे बनाने और देवी को अर्पित करने की परंपरा प्रचलित है।
61 फीट ऊंचे शिखर पर चढ़ाई गई सोने की परत
अंबाजी मंदिर सफेद संगमरमर से बना है। मंदिर के मुख्य शिखर की ऊंचाई लगभग 61 फीट बताई जाती है। शिखर पर सोने की परत चढ़ाने के लिए तांबे की चादरों पर नक्काशी की गई और फिर उन्हें सोने से मढ़कर स्थापित किया गया।
मंदिर ट्रस्ट से जुड़े विवरणों के अनुसार, इस काम के लिए श्रद्धालुओं ने सोना और धन दान किया था। शिखर पर सोने की परत चढ़ाने का काम सितंबर 2018 में पूरा हुआ था। इसके लिए लगभग 140 किलोग्राम सोना दान में मिलने का आंकड़ा भी बताया जाता है।
अंबाजी का प्रसिद्ध प्रसाद है मोहनथाल
अंबाजी मंदिर में मोहनथाल को पारंपरिक राजभोग और प्रसिद्ध प्रसाद के रूप में जाना जाता है। इसे बेसन, घी, दूध, चीनी और इलायची से तैयार किया जाता है। इसकी खास पहचान पीले रंग और दानेदार बनावट से होती है।
मोहनथाल तैयार होने के बाद पहले देवी को राजभोग के रूप में अर्पित किया जाता है। इसके बाद इसकी पैकिंग कर श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में दिया जाता है। इस पारंपरिक मिठाई को अंबाजी मंदिर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा माना जाता है।
अंबाजी मंदिर की खासियत यह है कि यहां श्री वीसा यंत्र की पूजा, देवी के बदलते श्रृंगार, गब्बर पहाड़ी की परिक्रमा और मोहनथाल के प्रसाद जैसी परंपराएं श्रद्धालुओं को एक अनूठा धार्मिक अनुभव प्रदान करती हैं।