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ब्लड डोनेट करने के बाद आखिर होता क्या है? क्या सीधे दूसरे इंसान को चढ़ा देते हैं खून? फिल्मों में छिपाई जाती है सच्चाई

 

जब कोई व्यक्ति ब्लड डोनेट करता है तो अक्सर लोगों के मन में एक सवाल जरूर आता है—क्या डोनर के शरीर से निकला खून सीधे किसी दूसरे मरीज की नस में चढ़ा दिया जाता है? फिल्मों में कई बार ऐसा ही दिखाया जाता है कि एक व्यक्ति का खून निकला और तुरंत दूसरे मरीज को लगा दिया गया। लेकिन असल अस्पतालों में प्रक्रिया इससे काफी अलग और ज्यादा सावधानी वाली होती है। डोनेट किया गया खून सीधे किसी मरीज को नहीं चढ़ाया जाता। पहले उसकी कई जांच और प्रोसेसिंग होती है, फिर जरूरत के मुताबिक उसके अलग-अलग हिस्सों का इस्तेमाल किया जाता है।

सबसे पहले ब्लड बैंक पहुंचता है खून

जब कोई व्यक्ति रक्तदान करता है, तो उसका रक्त एक विशेष बैग में एकत्र किया जाता है। इस बैग में ऐसे पदार्थ मौजूद होते हैं जो रक्त को कुछ समय तक सुरक्षित रखने में मदद करते हैं।इसके बाद ब्लड बैंक में रक्त की जांच की जाती है। डोनर के रक्त की ब्लड ग्रुपिंग और जरूरी संक्रमण संबंधी स्क्रीनिंग की जाती है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि रक्त मरीज के लिए सुरक्षित है।

सिर्फ ब्लड ग्रुप मिलना ही काफी नहीं

किसी मरीज को रक्त चढ़ाने से पहले केवल A, B, AB या O ग्रुप देखना पर्याप्त नहीं होता। मरीज और डोनर के रक्त की अनुकूलता भी जांची जाती है।अस्पताल में जरूरत के अनुसार क्रॉस-मैचिंग जैसी प्रक्रिया की जाती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि चुना गया रक्त मरीज के लिए उपयुक्त है और गंभीर प्रतिकूल प्रतिक्रिया का जोखिम कम हो।

पूरा खून एक साथ नहीं, हिस्सों में भी इस्तेमाल होता है

ब्लड डोनेशन की सबसे दिलचस्प बात यह है कि एक यूनिट रक्त को कई बार उसके अलग-अलग घटकों के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।रक्त से मुख्य रूप से लाल रक्त कोशिकाएं (RBC), प्लाज्मा और प्लेटलेट्स जैसे घटक अलग किए जा सकते हैं। जरूरत के हिसाब से किसी मरीज को इनमें से एक विशेष घटक दिया जा सकता है।मसलन, किसी मरीज को लाल रक्त कोशिकाओं की जरूरत हो सकती है, जबकि दूसरे मरीज के इलाज में प्लेटलेट्स की जरूरत पड़ सकती है।यानी एक रक्तदान से प्राप्त रक्त का इस्तेमाल परिस्थितियों के अनुसार एक से ज्यादा मरीजों के इलाज में मदद कर सकता है।

फ्रिज और विशेष तापमान पर रखा जाता है

रक्त को निकालने के बाद उसे सामान्य बोतल की तरह कहीं भी रख नहीं दिया जाता। अलग-अलग रक्त घटकों को उनकी जरूरत के अनुसार निर्धारित परिस्थितियों और तापमान में संग्रहित किया जाता है।ब्लड बैंक में इनका रिकॉर्ड भी रखा जाता है, ताकि जरूरत पड़ने पर सही रक्त घटक और सही यूनिट उपलब्ध कराई जा सके।

फिर मरीज को कैसे चढ़ाया जाता है?

जब डॉक्टर किसी मरीज के लिए रक्त या उसके किसी घटक की जरूरत तय करते हैं, तो ब्लड बैंक से उपयुक्त यूनिट जारी की जाती है। मरीज की पहचान और रक्त की अनुकूलता से जुड़ी जरूरी जांच के बाद उसे अस्पताल की निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार चढ़ाया जाता है।रक्त चढ़ाते समय मरीज की स्थिति पर भी नजर रखी जाती है, क्योंकि किसी भी ट्रांसफ्यूजन में सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण होती है।

फिल्मों में दिखाया जाता है बहुत आसान

फिल्मों और टीवी सीरियल में कई बार ऐसा दृश्य दिखता है कि किसी व्यक्ति से खून निकाला और पाइप के जरिए तुरंत दूसरे व्यक्ति को लगा दिया गया। वास्तविक चिकित्सा व्यवस्था इतनी सीधी नहीं होती।असल में रक्तदान से लेकर मरीज तक रक्त पहुंचने के बीच जांच, स्क्रीनिंग, संग्रहण, जरूरत पड़ने पर घटकों को अलग करना और अनुकूलता की पुष्टि जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं होती हैं।इसी वजह से अस्पताल में रक्त चढ़ाना प्रशिक्षित मेडिकल टीम की निगरानी में किया जाता है।

रक्तदान क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

ब्लड बैंक में सुरक्षित रक्त की उपलब्धता दुर्घटना के मरीजों, सर्जरी कराने वाले लोगों, गंभीर रूप से बीमार मरीजों और कई अन्य जरूरतमंदों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है।इसलिए रक्तदान सिर्फ “खून देने” की प्रक्रिया नहीं है। डोनर का रक्त अस्पताल पहुंचने के बाद एक नियंत्रित और जांची-परखी प्रक्रिया से गुजरता है, ताकि जरूरतमंद मरीज को सुरक्षित तरीके से सही रक्त घटक मिल सके।तो अगली बार फिल्मों में किसी को सीधे दूसरे व्यक्ति का खून चढ़ाते देखकर याद रखिए—असल जिंदगी में ब्लड डोनेशन के बाद सीधे नस में नहीं पहुंचता, बल्कि पहले ब्लड बैंक की जरूरी जांच और प्रोसेसिंग से गुजरता है।