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गौरीकुंज के नाम परिवर्तन विवाद को लेकर विरोध तेज, 1989 के करार का हवाला

 

एक बार फिर शहर में स्थित गौरीकुंज को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। नगर निगम द्वारा वहां “गीता भवन” बनाने के प्रस्ताव के बाद स्थानीय स्तर पर नाराजगी देखने को मिल रही है। खासकर कुछ सामाजिक संगठनों और किशोर प्रशंसकों ने इस प्रस्ताव का विरोध शुरू कर दिया है।

मामला वर्ष 1989 में नगर निगम और लोक कल्याण परिषद के बीच हुए एक करार से जुड़ा बताया जा रहा है। उस करार के अनुसार गौरीकुंज परिसर को परिषद को संचालन और संरक्षण के लिए दिया गया था। समझौते की एक महत्वपूर्ण शर्त यह भी बताई जा रही है कि इस परिसर का नाम किसी भी परिस्थिति में बदला नहीं जा सकता।

नगर निगम की ओर से हाल ही में गौरीकुंज परिसर में गीता भवन बनाने का एक प्रस्ताव तैयार किया गया है। अधिकारियों का मानना है कि इस भवन के निर्माण से धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा और क्षेत्र में सामाजिक आयोजनों के लिए एक बेहतर स्थान उपलब्ध होगा।

हालांकि, इस प्रस्ताव के सामने आते ही विवाद शुरू हो गया है। लोक कल्याण परिषद से जुड़े कुछ लोगों का कहना है कि यह कदम 1989 के करार की मूल भावना के खिलाफ है। उनका तर्क है कि जब स्पष्ट रूप से नाम परिवर्तन पर रोक लगाई गई थी, तो किसी भी प्रकार का बड़ा संरचनात्मक बदलाव उस समझौते की शर्तों का उल्लंघन माना जा सकता है।

वहीं, दूसरी ओर कुछ स्थानीय नागरिक और युवा वर्ग इस मुद्दे पर भावनात्मक रूप से प्रतिक्रिया दे रहे हैं। “किशोर प्रशंसक” कहे जा रहे समूह ने भी इस प्रस्ताव का विरोध जताया है। उनका कहना है कि गौरीकुंज केवल एक भवन नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान है, जिसे उसी रूप में संरक्षित रखा जाना चाहिए।

नगर निगम के अधिकारियों का कहना है कि प्रस्ताव अभी प्रारंभिक चरण में है और सभी कानूनी पहलुओं की जांच की जा रही है। निगम का दावा है कि किसी भी निर्णय से पहले करार की शर्तों और कानूनी प्रावधानों का पूरा अध्ययन किया जाएगा।

प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, यदि किसी प्रकार की शर्त का उल्लंघन पाया जाता है तो प्रस्ताव में संशोधन भी किया जा सकता है। वहीं, यह भी संभावना जताई जा रही है कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत के जरिए किसी समाधान तक पहुंचने की कोशिश की जाएगी।

इस पूरे विवाद ने शहर में एक नई बहस छेड़ दी है कि पुराने समझौतों और विरासत स्थलों के संरक्षण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। एक वर्ग विकास और नए निर्माण को जरूरी मानता है, जबकि दूसरा वर्ग ऐतिहासिक पहचान और मूल स्वरूप को बनाए रखने की वकालत कर रहा है।

फिलहाल मामला विचाराधीन है और नगर निगम की अगली बैठक में इस प्रस्ताव पर विस्तृत चर्चा होने की संभावना है। स्थानीय लोगों की नजर अब प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हुई है।