इंसानी शरीर में 9 महीने रही सुअर की किडनी, मेडिकल साइंस में बड़ी उपलब्धि
मेडिकल साइंस की दुनिया में एक बड़ी उपलब्धि सामने आई है। वैज्ञानिकों ने पहली बार इंसानी शरीर में सुअर (Pig) की किडनी को करीब 9 महीने तक सफलतापूर्वक काम करते हुए देखा। यह प्रयोग अंग प्रत्यारोपण (Organ Transplant) के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
लंबे समय से वैज्ञानिक मानव अंगों की कमी को दूर करने के लिए जानवरों के अंगों के इस्तेमाल पर शोध कर रहे हैं। इसे जेनोट्रांसप्लांटेशन (Xenotransplantation) कहा जाता है, जिसमें एक प्रजाति के अंग को दूसरी प्रजाति के शरीर में प्रत्यारोपित किया जाता है।
आनुवंशिक बदलाव के बाद तैयार की गई किडनी
इस प्रयोग में इस्तेमाल की गई सुअर की किडनी को विशेष रूप से जेनेटिक बदलावों के जरिए तैयार किया गया था, ताकि मानव शरीर उसे आसानी से स्वीकार कर सके। आमतौर पर शरीर बाहरी अंगों को अस्वीकार कर देता है, लेकिन वैज्ञानिकों ने प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया (Immune Rejection) को कम करने के लिए कई तकनीकों का इस्तेमाल किया।
शोधकर्ताओं के अनुसार, इस प्रयोग से यह समझने में मदद मिली कि भविष्य में सुअर के अंगों को मानव प्रत्यारोपण के विकल्प के रूप में कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है।
अंगों की कमी दूर करने की उम्मीद
दुनिया भर में लाखों लोग किडनी ट्रांसप्लांट का इंतजार करते हैं, लेकिन जरूरत के मुकाबले दान किए जाने वाले अंगों की संख्या काफी कम है। ऐसे में वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि जेनोट्रांसप्लांटेशन की मदद से अंगों की कमी को कम किया जा सकता है।
सुअर के अंगों को मानव अंगों के आकार और कार्यप्रणाली से कुछ हद तक समान माना जाता है, इसलिए वैज्ञानिक इन्हें प्रत्यारोपण के लिए संभावित विकल्प के रूप में देखते हैं।
अभी और शोध की जरूरत
हालांकि यह उपलब्धि बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से पहले कई और परीक्षणों की जरूरत होगी। वैज्ञानिकों को संक्रमण, लंबे समय तक अंग के काम करने और शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया जैसे पहलुओं पर लगातार अध्ययन करना होगा।
मेडिकल विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले वर्षों में यह तकनीक उन मरीजों के लिए उम्मीद की किरण बन सकती है, जिन्हें समय पर अंग नहीं मिल पाते।
इंसानी शरीर में सुअर की किडनी का 9 महीने तक काम करना चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में एक अहम पड़ाव माना जा रहा है। यह खोज भविष्य में अंग प्रत्यारोपण की पूरी तस्वीर बदल सकती है।