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मां का खून बच्चे को पोषण देता है, फिर भी ब्लड ग्रुप क्यों होता है अलग? जानिए असली वजह

 

गर्भावस्था के दौरान अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि जब मां का खून गर्भ में पल रहे बच्चे तक पोषण पहुंचाता है, तो फिर दोनों का ब्लड ग्रुप एक जैसा क्यों नहीं होता? असल में यह सवाल जितना सरल लगता है, इसका जवाब उतना ही रोचक और वैज्ञानिक है।

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि मां का खून सीधे तौर पर बच्चे के शरीर में नहीं जाता। गर्भ में मौजूद एक विशेष संरचना जिसे प्लेसेंटा कहा जाता है, मां और बच्चे के बीच एक प्राकृतिक “फिल्टर” की तरह काम करती है। यह प्लेसेंटा मां के खून से ऑक्सीजन, पोषक तत्व और जरूरी तत्व लेकर बच्चे तक पहुंचाती है, लेकिन दोनों के रक्त को आपस में मिलने नहीं देती।

इसका मतलब यह है कि मां और बच्चे का ब्लड सर्कुलेशन अलग-अलग रहता है। इसलिए मां का ब्लड ग्रुप सीधे बच्चे पर असर नहीं डालता।

अब असली कारण जेनेटिक्स (आनुवंशिकी) में छिपा है। बच्चे का ब्लड ग्रुप उसके माता-पिता दोनों से मिले जीन पर निर्भर करता है। यानी ब्लड ग्रुप तय करने का काम मां का खून नहीं, बल्कि माता-पिता के DNA (Genes) करते हैं।

उदाहरण के तौर पर, अगर मां का ब्लड ग्रुप A है और पिता का B, तो बच्चे का ब्लड ग्रुप A, B, AB या O कुछ भी हो सकता है। यह पूरी तरह जेनेटिक संयोजन पर निर्भर करता है, न कि मां के खून के संपर्क पर।

डॉक्टरों के अनुसार, गर्भावस्था में मां और बच्चे के ब्लड ग्रुप का अलग होना पूरी तरह सामान्य प्रक्रिया है। शरीर की प्राकृतिक संरचना इस तरह बनी होती है कि दोनों के बीच किसी तरह का सीधा रक्त आदान-प्रदान न हो।

हालांकि कुछ विशेष मामलों में Rh फैक्टर से जुड़ी समस्या हो सकती है, जिसे मेडिकल ट्रीटमेंट से नियंत्रित किया जा सकता है।

इस तरह साफ है कि मां का खून बच्चे को पोषण जरूर देता है, लेकिन उसका ब्लड ग्रुप तय नहीं करता—यह पूरी तरह जेनेटिक विरासत पर निर्भर करता है।