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Zepto से बंदे ने ऑर्डर किया 1900 का सामान, बिल का ब्रेकडाउन देख शख्स ने खोली कंपनी की पोल

 

आज के समय में तकनीक की बढ़ती पहुंच और सुविधाओं के चलते लोग पारंपरिक ऑफलाइन खरीदारी के बजाय ऑनलाइन शॉपिंग को ज्यादा प्राथमिकता देने लगे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है घर बैठे सामान मंगाने की सुविधा, समय की बचत और आकर्षक डिस्काउंट। लेकिन हर सुविधा की एक कीमत होती है, और कई बार ये कीमत छिपी होती है – जिसे ग्राहक तब जान पाते हैं जब उनके साथ 'खेल' हो चुका होता है।

हाल ही में एक ऐसा ही मामला सामने आया है, जिसने सोशल मीडिया पर हलचल मचा दी। एक रेडिट यूजर ने बताया कि उसने ग्रॉसरी डिलीवरी ऐप Zepto से 1,937 रुपये का सामान ऑर्डर किया। लेकिन जब उसने ब्रेकडाउन देखा तो उसके होश उड़ गए।

उस यूजर ने बताया कि उसे डिलीवरी कॉस्ट के नाम पर 65 रुपये, प्रोसेसिंग फीस के नाम पर 30 रुपये, हैंडलिंग कॉस्ट पर 11.30 रुपये का GST और प्रोसेसिंग फीस पर 5.40 रुपये का GST चार्ज किया गया। कुल मिलाकर उसका बिल 2,049 रुपये 10 पैसे तक पहुंच गया। यानी 112 रुपये अतिरिक्त सिर्फ फालतू शुल्कों की वजह से चुकाने पड़े।

इस यूजर ने पूरी कहानी रेडिट पर साझा की, जो वायरल हो गई। खबर लिखे जाने तक इस पोस्ट को 400 से ज्यादा अपवोट्स और करीब 90 कमेंट्स मिल चुके थे। कमेंट सेक्शन में भी लोगों ने यही बताया कि Zepto जैसी कंपनियां सुपर सेवर ऑफर या एक्स्ट्रा डिस्काउंट के नाम पर कस्टमर्स को लुभाती हैं, लेकिन बाद में अतिरिक्त शुल्कों के जरिए उनका बजट बिगाड़ देती हैं।

यूजर्स की प्रतिक्रियाएं

कई यूजर्स ने इसे “छुपे हुए चार्जेस का स्कैम” बताया। एक यूजर ने लिखा –

“Zepto का सुपर सेवर ऑफर एक तरह का झांसा है, जिसमें वो डिस्काउंट के नाम पर पहले लुभाते हैं और फिर ब्रेकडाउन में इतने चार्ज जोड़ देते हैं कि असली कीमत और ज्यादा हो जाती है।”

वहीं एक अन्य यूजर ने कहा –

“अब समझ में आ रहा है कि ऑफलाइन शॉपिंग ही सबसे बेहतर थी, जहां सब कुछ सामने होता था और बिल भी पारदर्शी होता था।”

कुछ यूजर्स ने यह भी सवाल उठाया कि जब कंपनी का GST और अन्य टैक्स में कोई रोल नहीं है, तो फिर प्रोसेसिंग फीस जैसी चीजें क्यों बनाई जाती हैं?

क्या सच में सस्ता है ऑनलाइन?

ऑनलाइन शॉपिंग में जो “सस्ता” दिखाया जाता है, वह कई बार सिर्फ एक मार्केटिंग ट्रिक होती है। शुरुआती कीमत में छूट जरूर दिखती है, लेकिन जब फाइनल पेमेंट पेज पर पहुंचते हैं तो डिलीवरी चार्ज, प्रोसेसिंग फीस, प्लेटफॉर्म फीस जैसे कई शुल्क जोड़ दिए जाते हैं, जो उपभोक्ता के बजट को बिगाड़ देते हैं।

इसके अलावा, उपभोक्ता को सामान देखकर, छूकर खरीदने का अनुभव भी नहीं मिलता, जो अक्सर गुणवत्ता को लेकर जोखिम पैदा करता है।

सरकार और उपभोक्ता संरक्षण

सरकार ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत ऑनलाइन कंपनियों के लिए कई दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिनमें कीमत की पारदर्शिता, फुल ब्रेकडाउन और रिफंड/रिटर्न पॉलिसी को लेकर नियम तय किए गए हैं। लेकिन इन नियमों का पालन हर प्लेटफॉर्म नहीं करता। खासकर जब बात छोटे चार्जेस की हो, जिन्हें ग्राहक अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

निष्कर्ष

डिजिटल युग में ऑनलाइन शॉपिंग सुविधाजनक जरूर है, लेकिन सतर्क रहना भी जरूरी है। सिर्फ डिस्काउंट और ऑफर के लालच में आकर आंख मूंदकर खरीदारी करना नुकसानदेह हो सकता है।

इस घटना ने एक बार फिर से यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम वाकई ऑनलाइन सस्ता खरीद रहे हैं, या हमसे केवल ‘सस्ता दिखाकर’ ज्यादा वसूला जा रहा है?

सावधानी ही सुरक्षा है – अगली बार कोई भी ऑनलाइन ऑर्डर करने से पहले ब्रेकडाउन जरूर देख लें!