Madhubani: न कागज, न रजिस्ट्री... सिर्फ भरोसे पर चल रही लाखों की खेती, बिहार का ‘कमला मॉडल’ बना मिसाल
बिहार के मधुबनी जिले में खेती का एक ऐसा अनोखा मॉडल देखने को मिल रहा है, जिसने लोगों को हैरान कर दिया है। यहां न कोई लिखित एग्रीमेंट होता है, न रजिस्ट्री और न ही कानूनी कागजों का झंझट। इसके बावजूद दशकों से किसान आपसी भरोसे और मौखिक समझौते के आधार पर खेती कर रहे हैं। खास बात यह है कि इस मॉडल से किसानों को अच्छा मुनाफा भी हो रहा है। इलाके में इसे “कमला मॉडल” के नाम से जाना जाता है।
दरअसल, मधुबनी के कई इलाकों में कमला नदी के किनारे बड़ी मात्रा में उपजाऊ जमीन मौजूद है। नदी के बहाव और मौसम के अनुसार यहां जमीन का स्वरूप बदलता रहता है। ऐसे में जमीन के स्थायी कागजात या सीमांकन हमेशा संभव नहीं हो पाता। इसी वजह से यहां वर्षों पहले किसानों ने आपसी सहमति और भरोसे पर खेती करने की परंपरा शुरू की थी।
स्थानीय लोगों के मुताबिक इस व्यवस्था में जमीन का इस्तेमाल करने वाले किसान और जमीन के मालिक के बीच सिर्फ मौखिक समझौता होता है। दोनों पक्ष तय कर लेते हैं कि खेती कैसे होगी और मुनाफा किस अनुपात में बांटा जाएगा। हैरानी की बात यह है कि बिना किसी कानूनी दस्तावेज के यह व्यवस्था कई दशकों से सफलतापूर्वक चल रही है।
किसानों का कहना है कि इस मॉडल की सबसे बड़ी ताकत आपसी विश्वास है। गांवों में लोग एक-दूसरे को लंबे समय से जानते हैं, इसलिए विवाद की संभावना बेहद कम रहती है। खेती से होने वाला लाभ भी पारदर्शी तरीके से बांटा जाता है। यही कारण है कि यह मॉडल आज भी मजबूती से कायम है।
कमला नदी के आसपास की जमीन बेहद उपजाऊ मानी जाती है। यहां धान, मक्का, सब्जियां और कई नकदी फसलें उगाई जाती हैं। अच्छी पैदावार के कारण किसानों को बढ़िया मुनाफा मिलता है। कई किसान बताते हैं कि कम लागत और आपसी सहयोग की वजह से खेती करना आसान हो जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मॉडल ग्रामीण समाज में सामाजिक विश्वास और सामुदायिक व्यवस्था की मजबूत मिसाल पेश करता है। जहां एक ओर जमीन को लेकर देश के कई हिस्सों में विवाद देखने को मिलते हैं, वहीं मधुबनी का यह मॉडल बिना कोर्ट-कचहरी के सफलतापूर्वक चल रहा है।
हालांकि बदलते समय और आधुनिक कानूनी प्रक्रियाओं के बीच इस तरह की व्यवस्था को चुनौती भी मिल रही है। नई पीढ़ी अब लिखित दस्तावेजों और कानूनी सुरक्षा को ज्यादा महत्व देने लगी है। इसके बावजूद गांवों में आज भी बड़ी संख्या में लोग पुराने भरोसे वाले सिस्टम को कायम रखे हुए हैं।
मधुबनी का यह अनोखा “कमला मॉडल” सिर्फ खेती का तरीका नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत में भरोसे और सामाजिक एकता की एक जीवंत मिसाल बन चुका है।