झारखंड हाईकोर्ट का फैसला: काजल-लिपस्टिक लगाने को पत्नी की मानसिक बीमारी बताने वाले पति की तलाक याचिका खारिज
झारखंड हाईकोर्ट ने एक तलाक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए उस पति की याचिका खारिज कर दी, जिसने पत्नी के काजल और लिपस्टिक लगाने की आदत को मानसिक बीमारी से जोड़ते हुए तलाक की मांग की थी। कोर्ट ने कहा कि नई दुल्हन का सजना-संवरना एक सामान्य व्यवहार है और इसे मानसिक बीमारी का आधार नहीं बनाया जा सकता।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति पर मानसिक बीमारी का आरोप लगाने के लिए ठोस चिकित्सकीय प्रमाण जरूरी होते हैं। केवल व्यवहार या व्यक्तिगत पसंद के आधार पर किसी को मानसिक रूप से बीमार नहीं बताया जा सकता।
पत्नी के सजने को बताया था मानसिक बीमारी
जानकारी के अनुसार, पति ने अदालत में दावा किया था कि उसकी पत्नी देर रात तक काजल और लिपस्टिक लगाती थी और यह व्यवहार सामान्य नहीं था। पति ने इसे पत्नी की मानसिक स्थिति से जोड़ते हुए तलाक की मांग की थी।
पति की ओर से दलील दी गई कि पत्नी के व्यवहार से वैवाहिक जीवन प्रभावित हो रहा है। लेकिन हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया और कहा कि किसी महिला का सजना-संवरना अपने आप में मानसिक बीमारी का संकेत नहीं है।
मेडिकल सबूत के बिना आरोप नहीं माना जा सकता
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मानसिक बीमारी जैसे गंभीर आरोपों को साबित करने के लिए मेडिकल रिपोर्ट या विशेषज्ञों की राय जरूरी होती है। बिना किसी चिकित्सकीय प्रमाण के लगाए गए आरोपों के आधार पर तलाक नहीं दिया जा सकता।अदालत ने कहा कि विवाह के बाद खासकर नई दुल्हन का अपनी पसंद के अनुसार सजना सामान्य सामाजिक व्यवहार का हिस्सा है। इसे पति-पत्नी के बीच विवाद या तलाक का आधार नहीं बनाया जा सकता।
मामले में सामने आया दहेज प्रताड़ना का पहलू
सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले से जुड़े अन्य तथ्यों पर भी गौर किया। कोर्ट के सामने यह बात सामने आई कि विवाद की जड़ दहेज प्रताड़ना से जुड़ी थी। इसके बाद अदालत ने पति की तलाक याचिका को खारिज कर दिया।हाईकोर्ट के इस फैसले को महिलाओं के अधिकार और वैवाहिक मामलों में कानूनी प्रक्रिया के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कोर्ट ने यह संदेश दिया कि किसी भी गंभीर आरोप के लिए प्रमाण जरूरी हैं, केवल व्यक्तिगत धारणाओं के आधार पर फैसले नहीं किए जा सकते।
सोशल मीडिया पर चर्चा
फैसले के बाद यह मामला सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बन गया है। कई लोगों ने कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि व्यक्तिगत पसंद और सामान्य व्यवहार को मानसिक बीमारी से जोड़ना उचित नहीं है।वहीं, कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि तलाक जैसे मामलों में अदालतें केवल आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि उपलब्ध सबूतों और परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लेती हैं।झारखंड हाईकोर्ट का यह फैसला एक बार फिर यह बताता है कि वैवाहिक विवादों में भावनाओं के साथ-साथ कानूनी प्रमाणों का महत्व सबसे ज्यादा होता है।