‘भारत में इंटरव्यू देना किसी जंग से कम नहीं’, 6 महीने से नौकरी तलाश रहा सॉफ्टवेयर इंजीनियर
भारत में नौकरी पाना और खासकर टेक सेक्टर में इंटरव्यू के कई राउंड पार करना उम्मीदवारों के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। इसी को लेकर एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म रेडिट पर अपना अनुभव साझा किया है। इंजीनियर का कहना है कि भारत में इंटरव्यू देना किसी जंग से कम नहीं है। पिछले छह महीनों से नौकरी की तलाश कर रहे इस टेक प्रोफेशनल के मुताबिक, लगातार कोशिशों के बावजूद अब तक उन्हें नौकरी नहीं मिल सकी है।
रेडिट पर अपनी परेशानी बताते हुए इंजीनियर ने भारत और यूरोप के हायरिंग प्रोसेस की तुलना की। उन्होंने दावा किया कि यूरोप में कंपनियों का भर्ती प्रक्रिया ज्यादा व्यवस्थित और उम्मीदवार के अनुभव को ध्यान में रखने वाली होती है, जबकि भारत में इंटरव्यू प्रक्रिया कई बार जरूरत से ज्यादा कठिन और लंबी हो जाती है। उनके मुताबिक, एक पद के लिए कई तकनीकी राउंड, कोडिंग टेस्ट, सिस्टम डिजाइन और अलग-अलग स्तर के इंटरव्यू से गुजरना पड़ सकता है।
इंजीनियर ने अपने पोस्ट में भारतीय कंपनियों के हायरिंग प्रोसेस को लेकर निराशा जाहिर की। उनका कहना है कि कई बार उम्मीदवार किसी पद के लिए जरूरी योग्यता और अनुभव रखता है, लेकिन इसके बावजूद इंटरव्यू प्रक्रिया में ऐसे सवाल पूछे जाते हैं जिनका वास्तविक नौकरी से सीधा संबंध नहीं होता। इससे उम्मीदवारों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और नौकरी की तलाश लंबी होती चली जाती है।
पिछले कुछ समय में टेक इंडस्ट्री में नौकरी का बाजार भी काफी प्रतिस्पर्धी हुआ है। बड़ी संख्या में अनुभवी प्रोफेशनल नई नौकरियों के लिए आवेदन कर रहे हैं। ऐसे में कंपनियों के पास उम्मीदवारों की लंबी सूची होती है और वे भर्ती के दौरान कई स्तरों पर उम्मीदवारों को परखने की कोशिश करती हैं। हालांकि, यही प्रक्रिया कई नौकरी तलाशने वालों के लिए थकाऊ साबित हो रही है।
रेडिट पोस्ट के बाद अन्य यूजर्स ने भी अपने अनुभव साझा किए। कुछ लोगों ने कहा कि उन्होंने भी भारत में नौकरी के लिए कई इंटरव्यू और टेस्ट दिए हैं, जबकि कुछ यूजर्स ने माना कि अलग-अलग कंपनियों और देशों की भर्ती प्रक्रिया में काफी अंतर होता है। कई लोगों ने यह भी कहा कि इंटरव्यू के दौरान उम्मीदवार की वास्तविक क्षमता के बजाय कभी-कभी याददाश्त या विशेष प्रकार के सवालों को ज्यादा महत्व दिया जाता है।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर का व्यक्तिगत अनुभव और राय है। इसे भारत की पूरी टेक इंडस्ट्री की भर्ती प्रक्रिया का प्रतिनिधि अनुभव नहीं माना जा सकता। अलग-अलग कंपनियों, भूमिकाओं और अनुभव के स्तर के आधार पर इंटरव्यू प्रक्रिया काफी अलग हो सकती है।
फिर भी इस पोस्ट ने भारत के हायरिंग सिस्टम को लेकर एक पुरानी बहस को फिर से चर्चा में ला दिया है। सवाल यह है कि कंपनियां उम्मीदवारों की तकनीकी क्षमता और समस्या सुलझाने की योग्यता को परखने के लिए कितने राउंड रखें और भर्ती प्रक्रिया को कितना सरल बनाया जा सकता है। छह महीने से नौकरी की तलाश कर रहे इस इंजीनियर की कहानी फिलहाल सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है।