भारत के इस स्कूल में खेती-बाड़ी सीखते हैं बच्चे, खुद उगाते हैं अपना लंच, ऑर्गनिक तरीके से पैदा होती हैं सब्जियां!
आमतौर पर स्कूल का नाम सुनते ही दिमाग में क्लासरूम, ब्लैकबोर्ड, किताबें और होमवर्क की तस्वीर सामने आती है। लेकिन भारत में एक ऐसा स्कूल भी है जहां बच्चों की पढ़ाई सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहती। यहां छात्र खुद खेती-बाड़ी करना सीखते हैं, मिट्टी में हाथ लगाते हैं और अपने खाने के लिए सब्जियां उगाने की प्रक्रिया को करीब से समझते हैं। यही अनोखा प्रयोग इस स्कूल को चर्चा में लाता है।
यहां बच्चों को खेत और बगीचे में काम करने का मौका दिया जाता है। वे पौधों को लगाने से लेकर उनकी देखभाल और सब्जियों की पैदावार तक की प्रक्रिया को समझते हैं। सबसे खास बात यह है कि स्कूल परिसर में उगाई जाने वाली सब्जियों का इस्तेमाल बच्चों के भोजन में भी किया जाता है।
किताबों के साथ मिट्टी से भी सीख रहे बच्चे
स्कूल में खेती को केवल काम के तौर पर नहीं, बल्कि व्यावहारिक शिक्षा का हिस्सा बनाया गया है। बच्चे सीखते हैं कि बीज को मिट्टी में कैसे लगाया जाता है, पौधे को पानी और धूप की कितनी जरूरत होती है और फसल तैयार होने में कितना समय लगता है।
इस तरह बच्चों को कृषि की पूरी प्रक्रिया किताब के पन्नों के बजाय अपनी आंखों के सामने दिखाई देती है। वे समझ पाते हैं कि बाजार में मिलने वाली सब्जियां आखिर खेत से हमारी थाली तक कैसे पहुंचती हैं।
खुद उगाते हैं अपना लंच
इस स्कूल की सबसे आकर्षक बात बच्चों का अपने भोजन से जुड़ाव है। स्कूल परिसर में उगाई गई सब्जियों को भोजन में इस्तेमाल करने की कोशिश की जाती है। इससे बच्चों को यह एहसास होता है कि खाना सिर्फ प्लेट में आने वाली चीज नहीं, बल्कि उसके पीछे किसान, मिट्टी, पानी, मेहनत और समय भी जुड़ा होता है।
अपने हाथों से उगाई गई सब्जियों को खाना बच्चों के लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं होता। इससे उनमें भोजन को लेकर जिम्मेदारी और उसकी बर्बादी रोकने की समझ भी विकसित हो सकती है।
ऑर्गेनिक खेती का भी दिया जाता है ज्ञान
स्कूल के इस मॉडल में प्राकृतिक और जैविक तरीके से खेती करने पर भी जोर दिया जाता है। बच्चों को मिट्टी की सेहत, प्राकृतिक खाद, पौधों की देखभाल और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी जैसी बातें सिखाई जाती हैं।
हालांकि, किसी भी स्कूल की खेती को औपचारिक रूप से ‘ऑर्गेनिक’ प्रमाणित कहने के लिए निर्धारित जैविक मानकों और प्रमाणन की स्थिति देखना जरूरी होता है। इसलिए सोशल मीडिया पर इस्तेमाल होने वाले ‘ऑर्गेनिक’ शब्द को प्रमाणित जैविक खेती का पर्याय मान लेना उचित नहीं है।
खेती से बच्चों को मिलती है कई सीख
इस तरह की गतिविधियां बच्चों को केवल खेती नहीं सिखातीं। इससे उनमें टीमवर्क, जिम्मेदारी, धैर्य और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता जैसी खूबियां विकसित करने का मौका मिलता है।
एक बीज लगाने के बाद अगले ही दिन फसल नहीं मिलती। पौधे को समय देना पड़ता है। पानी देना, खरपतवार हटाना और उसकी देखभाल करना पड़ता है। यही प्रक्रिया बच्चों को धैर्य और मेहनत का महत्व समझाती है।
पढ़ाई का यह अंदाज क्यों है खास?
आज जब बच्चे तेजी से स्क्रीन और डिजिटल दुनिया से जुड़ रहे हैं, ऐसे में उन्हें प्रकृति और जमीन से जोड़ने वाले प्रयोग काफी दिलचस्प नजर आते हैं। खेती को शिक्षा के साथ जोड़ने से बच्चे न सिर्फ भोजन की अहमियत समझते हैं, बल्कि कृषि और पर्यावरण के प्रति भी जागरूक हो सकते हैं।
यही वजह है कि जहां दूसरे स्कूलों में बच्चे लंच का इंतजार करते हैं, वहीं इस तरह के स्कूलों में बच्चे यह भी जान रहे हैं कि उनकी थाली में पहुंचने वाला खाना पैदा कैसे होता है। पढ़ाई के साथ खेती का यह मेल आने वाली पीढ़ी को प्रकृति से जोड़ने का अनोखा तरीका बन सकता है।