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सैंकड़ों साल पहले होता था ऐसा वॉटर फिल्टर, अमृत जैसा साफ हो जाता था पानी, डालना पड़ता था बस खास बीज

 

आज के दौर में पानी साफ करने के लिए RO, UV फिल्टर और कई तरह की आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि सदियों पहले भी लोग पानी को साफ करने के लिए प्राकृतिक तरीकों का इस्तेमाल करते थे? इनमें एक तरीका खास बीजों से पानी को साफ करने का था। इस पारंपरिक तकनीक में सहजन यानी मोरिंगा के बीज का इस्तेमाल किया जाता था।

मोरिंगा के बीजों में मौजूद कुछ प्राकृतिक प्रोटीन पानी में मौजूद मिट्टी और अन्य छोटे-छोटे कणों को एक-दूसरे के साथ चिपकाने में मदद कर सकते हैं। इस प्रक्रिया को फ्लोक्युलेशन कहा जाता है। जब ये कण आपस में जुड़कर बड़े और भारी गुच्छे बना लेते हैं तो वे नीचे बैठने लगते हैं। इसके बाद ऊपर का अपेक्षाकृत साफ पानी अलग किया जा सकता है।

यह तरीका खास तौर पर उन जगहों पर उपयोगी माना जाता रहा है, जहां आधुनिक जल शोधन की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। अलग-अलग क्षेत्रों में प्राकृतिक पदार्थों से पानी साफ करने की पारंपरिक तकनीकें विकसित हुई थीं। मोरिंगा के बीजों का उपयोग भी ऐसी ही प्राकृतिक जल शोधन विधियों में शामिल है।

मोरिंगा के बीज पानी में मौजूद गंदगी को नीचे बैठाने में मदद कर सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पानी पूरी तरह पीने योग्य और कीटाणुरहित हो जाता है। यह अंतर समझना बेहद जरूरी है। बीजों से पानी का मैल और कुछ अशुद्धियां कम हो सकती हैं, लेकिन इससे सभी वायरस, बैक्टीरिया और दूसरे रोगजनक पूरी तरह खत्म होने की गारंटी नहीं होती।

इसी वजह से प्राकृतिक तरीके से साफ किए गए पानी को पीने से पहले सुरक्षित बनाने के लिए उचित उबालना, फिल्ट्रेशन या प्रमाणित जल शोधन तकनीक जरूरी हो सकती है। केवल बीज डालकर पानी को सीधे पीना सुरक्षित तरीका नहीं माना जाना चाहिए।

इस पारंपरिक तरीके की खासियत यह है कि इसमें महंगी मशीन या बिजली की आवश्यकता नहीं होती। मोरिंगा का पौधा कई गर्म और उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में आसानी से उगता है, इसलिए इसके बीजों का उपयोग कम संसाधनों वाले इलाकों में पानी की गंदगी कम करने के लिए किया गया है।

वैज्ञानिक शोधों में भी मोरिंगा के बीजों में पाए जाने वाले प्राकृतिक प्रोटीन की पानी में मौजूद निलंबित कणों को एकत्र करने की क्षमता पर अध्ययन किया गया है। यही गुण इसे प्राकृतिक कोएगुलेंट के रूप में उपयोगी बनाता है।

यानी सैकड़ों साल पुराने इस तरीके को केवल अंधविश्वास या चमत्कार समझना सही नहीं होगा। इसके पीछे पानी में मौजूद कणों के एकत्र होने की वैज्ञानिक प्रक्रिया काम करती है। हालांकि इसे आधुनिक वॉटर प्यूरीफायर का पूरी तरह विकल्प भी नहीं माना जा सकता।

तो अगली बार जब आप मोरिंगा के बीजों के बारे में सुनें, तो याद रखें कि इनमें पानी की गंदगी को नीचे बैठाने की प्राकृतिक क्षमता जरूर है, लेकिन साफ दिखाई देने वाला पानी हमेशा सुरक्षित पीने योग्य हो, यह जरूरी नहीं है। यही इस पुराने जल शोधन तरीके की सबसे महत्वपूर्ण बात है।